मालकियत
तुमने मेरे साथ जो किया,
शायद ही कोई करता।
मैं तुमसे नहीं डरा था,
कदाचन ही कभी डरता।
तुमने सज्जनता की आड़ में खुद को छिपाया हैं ।
बड़े – बड़े वार्तालाप करके श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया हैं।
संयोग से तुम्हारे पास मकान हुआ और तुम उसके स्वामी बन बैठे।
हो किराएदार तुम भी काल के और तुम स्वत्व समझ बैठे।
फिर क्यों तुम्हारे मन में किराएदार के लिए ईर्ष्या उठती हैं?
फिर क्यों किराया क्षणिक देरी पर स्वामित्व की भावना उठती हैं?
तुम सिर्फ मकान के स्वामी हो किसी के जीवन के नहीं,
मैं सिर्फ किराएदार हूँ तुम्हारे संपत्ति का वारिस तो नहीं।
जिन्हें तुम निम्न समझते हो, कहीं उनकी भी अलकापुरी होगी।
जिन्हें तुम निम्न समझते हो, कभी उनके भी विद्रोह की सीमा टूटेगी।
उसमें तुम्हारा मकान और मालकियत ध्वस्त हो कर रह जाएगी।
तुम्हारे पोषित अहंकार की इच्छाएं सब ध्वस्त होकर बिखर जाएगी।
तुम अपना गुरूर दिखा कर किसी से वसूली करके खुद को महान समझते हो।
कुछ किताबें पढ़के, उन्हीं के अहंकार में गोते लगाकर खुद को विद्वान समझते हो।
बनाई होगी तुमने अपनी पद प्रतिष्ठा संपत्ति किसके लिए?
उन चन्द लोगों की याचिका पाने के लिए?
या जो बेहोशी से संभोग का परिणाम हुआ उनके लिए?
या चंद अंतिम शांति के स्वार्थ के लिए?
बनाई होगी तुमने जिस स्वार्थ से परिणाम अंततः बुरा होगा।
तुमने खुद को अहंकार के रत्नों से सजाया,
तुमने खुद को ही खुद के मूल्यों से सजाया,
सजालो, बनालो, पोषित कर लो ख़ुद को अंत अंततः ठीक न होगा।
मैं तुम्हारी सत्ता का विध्वंश मांगता हूँ ।
जिन्हें तुम निम्न समझते हो उनसे विद्रोह मांगता हूँ ।
मिटे तुम्हारी सत्ता तुम भी मिटो।
मिटे वो अयोग्य लोग जो मालकियत सजाए बैठे हैं।
मिटे वो जो अपने अहंकार सजाए बैठे हैं।
मैं अंतिम में तुम्हारी अशांति से शांति मांगता हूँ।
मैं तुम्हारे अहंकार का विध्वंश मांगता हूँ।
शांति! शांति! शांति!
– यथार्थ