यकीन ...
यकीन …
उस दिन
जब तुमने मेरे काँधे पे
अपना हाथ रखा था
कितने ख़ुशनुमा अहसास
मेरे ज़ह्न में
उत्तर आये थे
लगा
भटकते सफ़ीने को
जैसे साहिलों ने
अपनी आगोश में ले लिया हो
मगर मैं उन सुकून देते लम्हों को
कहाँ पहचान पायी थी
क्या खबर थी कि तुम
इज़हारे मुहब्बत के बहाने
मेरे कमजोर कांधों की
ताकत नाप रहे थे
मैंने
तुम्हें अपना सागर मान
अपने वज़ूद को
तुम्हें सौंप दिया
आज तक
तुम्हारी उँगलियों की वो छुअन
दूर तक
मेरे ज़िस्म में
सांसें लेती है
और मैं
पत्थर सी
अपनी हथेली पर गिरी
हकीकत की
इक बूँद को समेटे
अपने यकीन से ख़फ़ा
तारीकियों में सिमटी
तन्हा सी इस आस में खड़ी हूँ
कि शायद
वो यकीन
मेरे यकीन को
आगोश में ले के
कह दे
वो लम्हा ख्वाब था
ये मगर
हकीकत है
सुशील सरना