....मां.....
साथ रहकर भी लोग
समझते नही हालात यहां
मां वो है जो दूर रहकर भी
बिन कहे हर बात समझ लेती है
चोट मुझको लगी,
दर्द तुमको हुआ ।
आंसूं मेरे बहे
आंख तेरी भरी ।
जग न जांऊ जरा सी भी आवाज से
मुझको गोदी में अपनी सुलाती थी मां
मेरी खातिर न सोई कई रात वो
मुझको सीने से अपने लगाए रही
आज भी मेरी खातिर तड़पती है वो
आंसू अपने कभी वो दिखाती नही
अपने दुख दर्द सारे भुलाकर के मां
हाल हर वक्त मेरा ही है पूछती
दूर मीलों बैठी है मेरी मां
बिन बताये ही सब जान जाती है वो
बस दुवाऐं ही देती है हर पल मुझे
मेरी आवाज से भांप जाती है वो
रूबी चेतन शुक्ला