गीत
गीत
मन में मिलने की इच्छा पर
पाँव जकड़ती है मजबूरी।
सपने ही तो टूटे है बस
लेकिन हम क्या कर सकते हैं।
व्याकुल मन के इन घावों को
किस मरहम से भर सकते हैं।
तरकीबें कुछ काम न आयी
और नहीं मिट पायी दूरी।
खुशियों के ताले की चाबी
कहाँ खो गई पता नहीं है।
सही नहीं है भाग्य हमारा
और किसी की खता नहीं है।
कितना जोर लगाया फिर भी
सारी कोशिश रही अधूरी।
जाने कितनी रातों को हम
व्यर्थ जागकर खो बैठे हैं।
होंठों पर मुस्कान भले पर
अंदर – अंदर रो बैठे है।
अरमानों के प्रतिवेदन पर
हमको मिली नहीं मंजूरी।
राजेश पाली ‘सर्वप्रिय’