हुआ मोम मैं तो पिघलते पिघलते
हुआ मोम मैं तो पिघलते-पिघलते
वो लौ बन गए रात भर जलते-जलते
सहारा मुझे गर तुम्हारा न मिलता
मैं गिर ही पड़ा था संभलते-संभलते
सुबह चाल तारों की मद्धम हुई है
बहुत थक गए रात भर चलते-चलते
मुझे आईने से शिकायत नहीं है
मैं सचमुच हूं बदला बदलते-बदलते
मेरी ही लिखी वो ग़ज़ल गुनगुनाए
गई रात छत पर टहलते-टहलते
जो अश्कों के कपड़े पहन के हैं आए
थके ख़्वाब थे आँख में पलते-पलते
अभी कुछ दिनों तक बहारें रहेंगी
मुझे कह गई है खिज़ा चलते-चलते
तुम आते तो दिल फिर धड़कने ही लगता
तबीयत बहलती बहलते-बहलते
मुनव्वर मुकद्दस नदी बन गई है
पहाड़ों का दिल अब पिघलते-पिघलते
कई जन्म के बाद मुझतक है आई
मेरी रूह कपड़े बदलते-बदलते
सितारे गिला चांद से अब करेंगे
बहुत देर कर दी निकलते-निकलते