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12 Sep 2025 · 1 min read

हुआ मोम मैं तो पिघलते पिघलते

हुआ मोम मैं तो पिघलते-पिघलते
वो लौ बन गए रात भर जलते-जलते

सहारा मुझे गर तुम्हारा न मिलता
मैं गिर ही पड़ा था संभलते-संभलते

सुबह चाल तारों की मद्धम हुई है
बहुत थक गए रात भर चलते-चलते

मुझे आईने से शिकायत नहीं है
मैं सचमुच हूं बदला बदलते-बदलते

मेरी ही लिखी वो ग़ज़ल गुनगुनाए
गई रात छत पर टहलते-टहलते

जो अश्कों के कपड़े पहन के हैं आए
थके ख़्वाब थे आँख में पलते-पलते

अभी कुछ दिनों तक बहारें रहेंगी
मुझे कह गई है खिज़ा चलते-चलते

तुम आते तो दिल फिर धड़कने ही लगता
तबीयत बहलती बहलते-बहलते

मुनव्वर मुकद्दस नदी बन गई है
पहाड़ों का दिल अब पिघलते-पिघलते

कई जन्म के बाद मुझतक है आई
मेरी रूह कपड़े बदलते-बदलते

सितारे गिला चांद से अब करेंगे
बहुत देर कर दी निकलते-निकलते

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