नक्सल की अग्नि
जंगल की साँसों में
अब भी बारूद की गंध है,
जहाँ धान की बालियाँ
खून से भीगी मिट्टी में
झर जाती हैं बिना कंधे के।
यह लड़ाई
रोटी और इज़्ज़त के बीच फँसी
एक अदृश्य रेखा है
जिसे नक्शे पर खींचते हैं अफसर,
पर जीते हैं आदिवासी बच्चे,
जिनके सपनों में
अब भी खिलौने नहीं,
गोलियों की गूँज है।
लाल झंडे की आंधी
उठी थी खेतों से,
जहाँ मज़दूर की पीठ पर
कोड़ों की रेखाएँ थीं।
वह आंधी आज
बंकरों और बूटों के बीच
सिर्फ़ राख बनती जा रही है।
सरकार और बंदूक
दोनों ही
उसी भूखे पेट पर
अपना फरमान लिखते हैं,
और भूख
हर बार विद्रोह का नया नाम ले लेती है।
क्या नक्सल
सिर्फ़ हिंसा है?
या यह उस चुप्पी की चीख है
जो सदियों से दबाई गई थी?
जंगल अब भी पूछता है
“जब मेरी जड़ें काट दी जाती हैं
तो हरा कैसे रहूँ?”
कल के सपनों में
गाँव के बच्चे अब
न तो किसान देखते हैं
न गीत।
वे सिर्फ़ गुप्त रास्तों के नक्शे
और हथियारों की
छाया पहचानते हैं।
शिक्षा की किताबें
गोली से हल्की पड़ गई हैं,
और माँ की लोरी
बारूदी सुरंगों के धमाके में
डूब जाती है।
भविष्य
अब न नदी की धुन है,
न पगडंडी की लय।
वह एक अंधा कुआँ है
जिसमें उतरता हर कदम
बस और गहराई में
चला जाता है।
सत्ता की चालें
और विद्रोह की आँच
दोनों मिलकर
जनता को गर्त की
ओर धकेलते हैं।
वह भविष्य
जो रोटी, मिट्टी और
सपनों का होना था,
अब केवल
खून, धूल और
सन्नाटे की गूँज है।