द्वंद माना बढ़ाना नहीं चाहिए
द्वंद माना बढ़ाना नहीं चाहिए
सच से मुँह पर छुपाना नहीं चाहिए
जो पनपने न दे प्रेम की बेल को
हमको ऐसा ज़माना नहीं चाहिए
तुमको सच में मुहब्बत किसी से है गर
उसका दिल फिर दुखाना नहीं चाहिए
भूल तो भूल है होती रहती यहाँ
भूल को दोहराना नहीं चाहिए
एक दिन आँख भी साथ ना छोड़ दें
खुद को इतना रुलाना नहीं चाहिए
झूठ को चाहिए सिर छुपाने को छत
सच को कोई ठिकाना नहीं चाहिए
जानने के लिए प्यार की असलियत
क्यों इसे आज़माना नहीं चाहिए
ज़िंदगी कुछ ख़ुशी के भी नग़में सुना
दर्द का ही तराना नहीं चाहिए
ज़िंदगी से ये सीखा सबक ‘अर्चना’
राज़ दिल के बताना नहीं चाहिए
डॉ अर्चना गुप्ता
11 .09.2025