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11 Sep 2025 · 1 min read

महके हुए ख्वाब

मेरे सिरहाने कोई खुशबू बिखर गई
कुछ ख्वाब जो महके हुए रात आए थे।

चुपके से उन यादों ने हाथ थाम लिया,
सांसों में धीरे‑धीरे रंग समा गए थे।

तारों की चादर पर सोई थी ये बात,
चाँदनी की लोरी में खोए अरमान थे।

बेख़बर सपनों की डगर पर चलते हुए,
दिल में कहीं छुपे अनगिनत जज़्बात थे।

अब सुबह की किरणों में भी वो महक है,
हर पल में उनके एहसास समाए हैं।

मेरे सिरहाने बिखरी वो खुशबू आज भी,
मेरे दिल के वीराने को रंगों से सजाए है।
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”

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