महके हुए ख्वाब
मेरे सिरहाने कोई खुशबू बिखर गई
कुछ ख्वाब जो महके हुए रात आए थे।
चुपके से उन यादों ने हाथ थाम लिया,
सांसों में धीरे‑धीरे रंग समा गए थे।
तारों की चादर पर सोई थी ये बात,
चाँदनी की लोरी में खोए अरमान थे।
बेख़बर सपनों की डगर पर चलते हुए,
दिल में कहीं छुपे अनगिनत जज़्बात थे।
अब सुबह की किरणों में भी वो महक है,
हर पल में उनके एहसास समाए हैं।
मेरे सिरहाने बिखरी वो खुशबू आज भी,
मेरे दिल के वीराने को रंगों से सजाए है।
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”