शादी कोई समाधान नहीं
बेटी बिगड़ी, न काम की भूखी,
न किताबों में मन, न रसोई की सुखी।
पिता ने सोचा – बोझ उतारें,
शादी करके फ़र्ज़ निभाएँ।
सज-धज के दुल्हन उतरी,
आदतें मगर वही पुरानी।
ससुराल में कदम रखते ही,
शुरू हुई तकरार की कहानी।
बर्तन छूने से कतराती,
ज़रा-सा कहना तो चिल्लाती।
फ़ोन पे घंटे, घर में शोर,
सास-ससुर सब हुए चित्कार।
पति ने समझाया, प्यार जताया,
पर उसने तांडव ही मचाया।
रो-रो माँ को फ़ोन मिलाया –
“मुझ पर अत्याचार कराया!”
माँ बोली – “चुप न रहना,
क़ानून है बेटा, डरना मत।”
कलम की नोक पे केस लिखा,
ससुराल वालों का चैन छीना।
माँ ने कहा – “तू है लाड़ली रानी,
घर-गृहस्थी तुझसे क्या जानी?
ना तुझे मेहनत, ना संस्कार की ज़रूरत,
बस पति को बना ले एटीएम की मूरत।”
बच्चे भी बने हथियार यहाँ,
“पालन-पोषण” का व्यापार यहाँ।
ना किताबें, ना संस्कार की माँग,
बस हर महीने चाहिए पैसा ढेरों ढेर।
पिता अदालत में किस्मत रोए,
बच्चों के बहाने नोट संजोए।
माँ-बेटी हँसकर ताली बजाएँ,
“देखो! क़ानून से कैसे कमाएँ।”
संस्कार का ठेका फेसबुक को दे दिया,
“आज़ादी” का मतलब बिगाड़ को ले लिया।
अब माँ-बेटी गर्व से कहतीं बार-बार,
“पति रहे गुलाम, मिले हमें अधिकार।”
—
संदेश
शादी नहीं है जादू का हल,
संस्कार ही देते जीवन का फल।
क़ानून का जब दुरुपयोग हो जाता,
दोनों घरों का दीप बुझ जाता।
बच्चों के भविष्य बिक जाते बाज़ार,
जब पालन-पोषण भी बन जाए व्यापार।
जिस बेटी को माँ ने सिर पे चढ़ाया,
उसने ही दोनों घरों का दीपक बुझाया।
क़ानून की आड़ में खेला जो खेल,
संस्कार हारे, जीत गया झूठ का मेल।