#सामयिक-
#सामयिक-
■ मानो न मानो, मेरी बला से।।
●(प्रणय प्रभात)●
इन दिनों देश में धर्म दंगल का शोर मचा हुआ है। पूरे विश्व समुदाय को एक करने का दावा करने वाले स्वयं कबड्डी खेल रहे हैं। धर्म विकल है और वास्तविक धर्मनिष्ठ सांसत में। चेले गुरु बनने की दौड़ में हैं तो गुरु महागुरु बनने की जुगत में। विश्वगुरु ब धर्माचार्य एक दूसरे को बौना साबित करने का अवसर हाथ से जाने देने को तैयार नहीं। ऐसे में धर्मरक्षा के लिए संस्थापित अखाड़े परस्पर पूरक के बजाय विरुद्ध सिद्ध हो जाएं तो हैरत नहीं।
ऐसे में गुरु शिष्य परम्परा तक का कबाड़ा करने वाले स्वयंभू धर्म सम्राटों से अच्छे तो वो मित्र सिद्ध हो सकते हैं, जो सच में मित्र ही हों। मेरा मानना है कि मित्र मात्र साथी ही नहीं, अग्रगामी, सहगामी व अनुगामी भी हो सकता है। प्रेरक, उत्प्रेरक, मार्गदर्शक व शिक्षक भी। अपनी समायोचित योग्यता व पात्रता के अनुरूप। प्रभु श्रीकृष्ण व अर्जुन की तरह। माधव और उद्धव की तरह। प्रभु श्री राम व महाबली हनुमान की तरह अथवा महर्षि याज्ञवल्क्य व महर्षि भरद्वाज की तरह।
इसी तरह से शिक्षक कोई मित्र ही नहीं एक शत्रु भी हो सकता है। शेषावतार लक्ष्मण के लिए महापंडित रावण की तरह। निरीह जीव व मूक प्रकृति से लेकर सर्वशक्तिमान ईश्वर तक, कोई भी। भगवान दत्तात्रय की धारणा व शिक्षा के अनुसार।
साथी एक सच्चा साथी ही नहीं सब कुछ हो सकता है अपने मित्र के लिए। विप्र सुदामा के लिए श्री द्वारकाधीश व निरीह सुग्रीव के लिए प्रभु श्री राघव जैसा। विस्तृत जानकारी के लिए श्री रामचरित मानस के किष्किंधा कांड में वर्णित राम-सुग्रीव मैत्री प्रसंग की “कुपथ निवार सुपंथ चलावा” व “जेहि न मित्र सम होय दुखारी” जैसी अर्द्धालियों का अध्ययन कर सकते हैं आप।
विनयवत और विवेकशील हों तो, क्या नहीं समझ व सीख सकता कोई? यह वही पुण्यभूमि है, जहां संतत्व को प्राप्त एक काग “कागभुशुण्डि” बन कर “पक्षीराज गरुड़” को गूढ़ ज्ञान दे चुका है। वैसे भी धर्मग्रन्थों का ज्ञान हम जैसे अल्पज्ञानी जिज्ञासुओं के लिए ही तो है। ऐंठ व अकड़ के मारे ज्ञान-गणपतियों और गोबर-गणेशों के लिए नहीं। उनका शिक्षक केवल समय ही हो सकता है। जो अनंत काल से सुधारने का काम गुपचुप तरीके से करता आ रहा है।
अपनी विराट संस्कृति के पक्षधर हम व हमारी सोच के जीव तो बच्चों तक से सीख लेने व बूढ़ों तक को उचित शिक्षा देने में भरोसा रखते हैं। बस इसीलिए हमारे मित्र एक-दो नहीं, तीन तीन पीढ़ियों में रहे हैं। बच्चे भी, बाप भी और बाप के बाप यानि दादा जी भी। यह भी प्रभु श्री की असीम कृपा है। अब दुनिया के अधकचरे धर्म धुरंधरों के बेतुके तर्क कैसे स्वीकार करें, आप ही बताएं। साथ ही यह भी तय करें कि निज बर्चस्व के लिए मल्लयुद्ध करने वालों के लिए कथित धर्मयुद्ध के मोहरे नहीं बनेंगे। उनके लिए तो कतई नहीं, जो अपने अहंकार की प्रभुदाता के लिए धर्म को धर्मराज की तरह दांव पर लगा रहे हैं। विडंबना हे कि हमें उनके “लंगोट” धर्म की पताका दिखाई दे रहे हैं।
स्मरण रखिए कि पदवी व उपाधि संसार प्रदत्त है। इसके पात्र का निर्णय कभी विद्वत जन करते थे, आज भीड़ से प्रेरित मंडली करती है। वही मंडली, जो लटकों झटकों से सुर्खी में आई एक सिने तारिका को महा मंडलेश्वर तक का तमगा दे डालती है। एक बिंदास यूट्यूबर को जबरन साध्वी घोषित कर देती है। वही भीड़, जो चाहे जिसे संत ठहरा कर “बाबा” बना देती है। उनके कर्म या हुलिए से “बाबा” का विशेषण जोड़ कर। आप समय की गंभीरता को भांपिए बस। उन कथित धर्मात्माओं से उचित दूरी रखिए, जो कर्म से आस्थाधील मर्म ब धर्म दोनों को लज्जित कर रहे हैं। मंतव्य की मांग के अनुसार गंतव्य तक जाने के लिए उपाधि नहीं केवल संतत्व देखिए।।
जय राम जी की।।
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संपादक
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