ज़िंदगी
आती नहीं है रास ये महलों कि ज़िंदगी।
कितनी हुई उदास अब सपनों की ज़िंदगी।
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दो जानू होके बैठ जा उस्ताद के करीब।
एहसास को जगाती है हुजरो की ज़िंदगी।
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बरबादियों के चर्चे तू करता है ग़ैर से।
अपनों ने ही तबाह की अपनों की ज़िंदगी।
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कैसे कबूल करते हक़ीक़त की रोशनी।
जिनको पसंद है बस अंधेरों की ज़िंदगी।
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रब की रज़ा पे और किनाअ़त है रिज़्क पे।
बेहतर गुज़र रही है परिंदों की ज़िंदगी।
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दावा वह कर रहा है हिफाज़त में है अ़वाम।
बर्बाद जिसने कर दिया, कितनों की ज़िंदगी।
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उम्मीद बन के रहता है कुल खानदान का।
आसान भी नहीं है, मर्दों की ज़िंदगी।
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रस्मे वफा का धागा जो पहना है भाई ने।
कु़र्बान भाइयों पे है बहनों की ज़िंदगी।
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टीवी से चिपके रहते बच्चे भी आजकल तो।
मोबाइल ने बिगाड़ दी बच्चों की ज़िंदगी।
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हर लम्हे सिखाते है तजुर्बाते ज़िंदगी।
सगी़र है खुली किताब, बुजु़र्गों की जिंदगी।