कोई पाप किया
एक बात लाखों पछतावे,किया ना कुछ भारी चिंताएं
किसे कहूं अपनी ये बातें, ज़ाहिर ना करूं बीती रातें
एक सोच थी भाग जाने की, सोच एक मिट जाने की
कुछ नहीं गलती मेरी पर, लगता हैं क्यों कोई पाप किया।
शत्रु ख़ुद का ख़ुद ही बना,रो–रो कर मन को अशांत किया पाप विशाल हुआ है जान, इतना विचलित मन को किया
सकारात्मक मज़ाक लग रही, ना,नहीं ने जीवन बांध रखा
बातचीत अपनों से कम ,लगता हैं क्यों कोई पाप किया।
उपाय चला शांति पाने का,पर सारा जिम्मा बर्बाद हुआ
कोई मिले अपना तो कहे, मन अब ऐसा विचार करें
शरीर सुखा,बाल पक रहे, खाने–पीने का मन ना लगे
किया है जो ना करना था, लगता हैं क्यों कोई पाप किया।