( छत्तीसगढ़ी हास्य व्यंग्य कविता * दुर्ग ठगड़ा बांध* )
( छत्तीसगढ़ी हास्य व्यंग्य कविता * दुर्ग ठगड़ा बांध* )
सुनो अब हमर ठगड़ा बांध बन गेहे पिकनिक स्पाट,
अब उहों गा भांटो अब्बड़ गम्मत होही दिन अउ रात।
फ्लाई ओवर से ठगड़ बांधा हा अब्बड़ नीक दिखते,
अउ ओला देखत देखत उप्पर ले कूदे के मन करथे।
एखर पीछे शायद अनुज के बुद्धि अउ मेहनत हवय,
पीयइया मन बर जुन्ना नरवा नाली आज जन्नत हवय।
अभी वो बने ठौर हवय परेमी टुरी टुरा मन के मिले के,
जेन मन परेम नइ जानय उंखर कटकटा के जले के।
कोन जानही के दु महीना बाद ओखर हाल का होही,
रोका छेका नइ रीहि भैया तो उहां कुकुर बिलई सोही।
हम जानथन कल उहां सरकार टिकिट घलो लगाही,
नई तो उहू बरपेली बनाय चौपाटी कस उजड़ जाही।
चुनाव जीते बर, बने कस मरघटटी घलो बनाना चाही,
दुरूग के जनता ला खुसी खुसी उप्पर पहुंचाना चाही।
( डॉ संजय दानी दुर्ग )