फ़िल्मों में पकड़े जाते थे कई लुटेरे
ग़ज़ल
फ़िल्मों में पकड़े जाते थे कई लुटेरे
पर जीवन में साथ रहे वो तेरे-मेरे
इक चेहरा था, लगा लिए उसपर भी चेहरे
दानिशमंद भी हमने देख लिए बहुतेरे
देखी गर तवारीख तो तुमको पता चलेगा
उथले हैं सब राज़ जो तुमको लगते गहरे
जहां पे मौक़ा मिला वहीं तुम तैर रहे रहे थे
जाने किसको लगते हो तुम ठहरे-ठहरे
झूठको अपने, उसने यूं बलवान बनाया
झूठ पे अपने, उसने बिठा दिए सौ पहरे
भैंस के आगे बीन बजाके क्या करना है
सांपों के ही दोस्त बने हैं कई संपेरे
मुझे तरक़्क़ी के हथकण्डे सब मालुम हैं
तुटनेवाले बन जाते इक रोज़ लुटेरे
-संजय ग्रोवर
( तस्वीर: गूगल सर्च की मदद से )
दानिशमंद= बुद्धिजीवी, राज़=रहस्य, तवारीख़=इतिहास