धरतीपुत्र
हिन्दी कविता
शीर्षक: “धरतीपुत्र”
(बुधवार, 10 सितम्बर 2025)
———————————-
सब जलमगन है, तरबतर है।
क्या डगर-पगडंडी, गांव-शहर है।
रास्ते सब रुक रुक से हैं,
हौसले कहां थके थके से हैं।।
यूं ही नहीं कहते
जय-जवान, जय -किसान।
जब-जब आए मुसीबत,
अपने आप निकलते समाधान।।
देश दुनिया में होती जय जयकार।
रास्ता रोक न पाए आंधी-तूफान, बारिश मूसलाधार।।
हम हक की कमाते
हक की खाते।
नाहक किसी का दिल ना दुखाते।।
कदम कदम पर सबक मिले,
ना घबराते, ना जी चुराते।।
गिरकर उठना बखूबी आता,
धरती पुत्र कहां डगमगाते।।
अड गए तो अड गए,
अंजाम जो भी हो देख लेंगे।
सरकारों से भी लड़ गए,
परिणाम जो भी हो देख लेंगे।।
जीना है जिंदा रहकर
मुर्दा दिल हुए तो क्या जीना।
बेजान पुतला क्या जाने
खून से महंगा है पसीना।।
बात जब आए वतन की
कौम इंसानियत,
भारतीयता मेरा धर्म है।
हर घर परिवार मेरा
हर दर्द मेरा मर्म है।।
अब आएंगे कुछ नींद से उठकर
और सुर्खियों में छा जाएंगे।
वो छोटी-छोटी कहानी को
मुख पृष्ठ पर छपवाएंगे।।
अपनी भलमानसी के ढिंढोरे पिटवाएंगे।
झूठे नेता, झूठे गीत,
शान से बजवाएंगे।।
पर हमें नहीं झांसे में आना,
ना कोई धोखा खाएंगे।
हम मेहनतकश को वह क्या जाने,
हम डूब कर भी तर जाएंगे।।
शिव शंकर के उपासक हैं हम,
जी रहे पीकर जहर।
सब जल मग्न है, तरबतर है।
क्या डगर-पगडंडी, गांव-शहर हैं।
रास्ते सब रुके रुके से हैं।
होंसले कहां थके थके से हैं।
-सुनील सैनी “सीना”
राम नगर, रोहतक रोड़, जीन्द(हरियाणा)-126102.