अर्थकलिका समीक्षा
“अर्थकलिका” गीत संग्रह- श्री मती मनोरमा जैन पाखी
पुस्तक समीक्षा– नवनीत पाण्डेय सेवटा (चंकी)
अन्तस मन की उद्वेलित अश्रु वेदना जीवनी उपवन को सिंचित करते हुए सांसारिकता से सामंजस्य स्थापित करने लगती है तो वहीं वेदना कलम की स्याही बन अनेक भाव बन पृष्ठों पर उकेरने लगती है।
अर्थकलिका श्री मती मनोरमा जैन पाखी जी द्वारा लिखित पद्य रचना है जो बुकफ्यालों से प्रकाशित किया गया है, जिसमें सुंदर कवर पृष्ठ एवं स्पष्ट टंकण व्यवस्था से पुस्तक सुसज्जित है, जो पचास पृष्ठों की एक लघु पद्य रचना है जिसका भारतीय मूल्य मात्र २१० ₹ है जो साहित्य प्रेमी है उनके लिए आज के समय में यह कोई बहुत भारी रकम नहीं है, जहाँ से ज्ञान मार्गदर्शन प्राप्त हो वहाँ धन मायने नहीं रखता है पुस्तक सदैव ज्ञान से भरी होती है कहीं ज्यादा तो कहीं कम।
पुस्तक के नाम से ही पाठक को समझना चाहिए कि अर्थकलिका में कितना सार गर्भित अर्थ समायोजित हुआ है, अर्थकलिका जो संस्कृत भाषा के शब्दावली से उद्धृत है जिसका शब्द भेद संज्ञा स्त्रीलिंग है।
“अर्थ की व्याख्या” का अर्थ है किसी शब्द, वाक्य या विचार के गहरे या निहितार्थ को समझाना या स्पष्ट करना, यह शब्द के सीधे शाब्दिक अर्थ से परे जाकर उससे जुड़े हुए सभी अर्थों, भावनाओं और उद्देश्यों को समझने की प्रक्रिया है, संदर्भ के आधार पर ‘अर्थ’ का मतलब ‘धन’ या ‘जीवन का उद्देश्य’ भी हो सकता है, लेकिन सामान्य तौर पर इसका अर्थ किसी भी चीज़ के निहितार्थ को स्पष्ट करना है।
कलिका का अर्थ है (फूल का बिना खिला हुआ रूप), वीणा का मूल तथा प्राचीन काल का बाजा जिस पर चमड़ा गढ़ा जाता है।
एक व्यक्ति के सन्दर्भ में यदि किसी व्यक्ति को कलिका कहा जाता है तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि वह एक कली की तरह कोमल एवम् नाजुक है।
संस्कृत एक कली या फूल का शुरुवाती अंकुर जो अभी तक खिला ना हो।
संस्कृत पद रचना या समय का एक छोटा अंश (कला या मुहूर्त)
संस्कृत के कलिका शब्द का प्रयोग संदर्भों में होता है जिसमें वनस्पति विज्ञान से लेकर संगीत और समय की माप तक शामिल है।
जैसा कि कवयित्री समर्पण में ही कह रही है कि यह उनका प्रथम छंद गीत पुष्प माँ शारदे के श्री चरणों में समर्पित किया है।
प्रेम को अपने अंतस स्थल वीणा मूल से शब्द भावों में उकेर रही है।
कवयित्री स्वयं स्वीकार कर रही है कि वह छंद से दूर थी उनमें लग्न एवम् उनका मनोबल बढ़ा उनका मार्ग दर्शक बने आदरणीय श्री रामनाथ साहू जी जो कवयित्री का हौसला बढ़ाया।
मेरी बात पृष्ठ ५ व ६ पर कवयित्री ने छंद की सामासिक व्याख्या दिया है जिसे समझने एवम् न जानने वाले हेतु बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
पृष्ठ क्रमांक ७ पर पण्डित संजीव शुक्ला सचिन (नादान जी) एवं पृष्ठ ८ व ९ पर डॉ अनुराधा पाण्डेय केसरी जी ने एक उत्तम विमोचन कर पुस्तक पढ़ने हेतु पाठक में एक अलग ही विचार धारा प्रवाहित कर दिया, जिससे पाठक पुस्तक के भाव से जुड़कर साहित्य का प्रसाद ग्रहण कर अपने जीवन में कर्त्तव्य पथ पर बढ़कर जीवन सार्थक बना सकता है।
लखनऊ के अमरनाथ जी कि काव्य पंक्तियाँ कवयित्री के जीवन संघर्ष की कहानी स्पर्श कर रही है-
उड़ते पंख मनोरम लगते
जैसे जीवन छाया हो।
जैसे स्वयं वीणापाणिने
सात स्वरों में गाया हो।।
यह पुस्तक ३८ कविताओं का एक सुंदर छंद गीत संग्रह की जयमाला है-
पृष्ठ क्रमांक १३ से कविता का आरम्भ होता है उसके पहले कवयित्री के शुभचिंतक मित्र जनों ने शुभकामनाए एवं सुंदर विमोचन कर पुस्तक शब्दावली को त्रुटि पूर्ण बनाने का पूर्ण प्रयास किया है।
प्रथम कविता से लगता है कि कवयित्री जीवन में रिश्तों को झूठा बताया है जिससे व्यक्ति जुड़ा होता है जिसमें व्यक्ति स्वयं जुड़ जीवन में दुःख के काँटे स्वयं बोया है –
झूठे रिश्तों में बंधकर अब तक जीवन खोया।
अपने ही हाथों मैया, कंटक बीज बोया।।
मैं अपने अनुभवों से यहीं कहना चाहता हूँ कि रिश्ता कोई झूठा नहीं होता है उस रिश्तों को निभाने वाला व्यक्ति अपने स्वार्थ में बहुमूल्य रिश्तों को ठुकरा कर रिश्तों की मर्यादा महत्त्व को भूल सा जाता है।
करूँ वंदना भारती
कविता में कवयित्री ने माता अम्बे, माँ शारदे की सुंदर लय बद्ध तुकांत से परिपूर्ण रूप माता अम्बे की आरती कर जीवन में भक्ति ज्योति जागृत किया है, जिससे पता चलता है कि कवयित्री भक्ति साधना से ओत प्रोत है।
अमर प्रेम कहते गीत
कुञ्जों में गुँजे गीत जहाँ झरना मन का।
अधर मौन पर हृदय पुकारे सपना जीवन का।
जीवन की वास्तविकता में राधिका रूपी प्रेमिका कहती है कि जिस गीत में कुञ्ज में गुँजे मन का झरना सा ओंठ मौन हो पर हृदय सभी भाव कह दे वहीं जीवन का सपना है।
कवयित्री ने कर्त्तव्य को एक कठिन पथ बताया है और कह रही है कि पीछे मत हटाना, जीवन में कर्त्तव्य पथ पर कितनी भी बड़ी कठिनाई हो उससे दूर नहीं जाना चाहिए।
संकट में पथ पर डेट रहना अपने पथ से विचलित मत होना, जो तुम्हारी ताकत बनेगा, यह पंक्तियाँ जीवन पथ पर अग्रसर रहने हेतु प्रेरणा प्रदान कर रही हैं जो साफ शब्दों में कह रही हैं संकट के तूफानों से लड़कर अपने जीवन में आगे ही बढ़ते जाना-
कर्तव्य पथ पर कितना पीछे मत हटाना।
संकट की संध्या में ही तो ताकतवर बना।।
कवयित्री द्वैत से अद्वैत भाव से जुड़कर कहती हैं कि व्यक्ति अपने यौवनावस्था में माया में इतना मदमस्त हो है कि उसे यह शरीर अति प्रिय लग रहा है, कोठों की कैद वह मोह जाल है जहाँ आत्मा परमात्मा से साक्षात्कार करती है तो उसे यह कोठी की कैद की हरियाली मुर्झाया जान पड़ता है।
कारे – कारे गेसू तेरे लुटे चैना।
जागे – जागे नैना सोई – सोई रैना।।
कवयित्री ने कविता में अनुप्रास अलंकार
कारे – कारे, जागे – जागे
रूपक अलंकार कारे गेसू जहाँ बालों की तुलना काले रंग से की जा रही है
विरोधाभास अलंकार जागे – जागे नैना, सोई – सोई रैना
प्राची दिश से आए मेघा कारे।
संझा बेला धीरे धीरे आई द्वारे।।
पूर्व दिशा से मेघा बादल का आना सुंदर शांति पूर्ण दृश्य को दर्शाया है जहाँ संध्या समय की सुंदरता को दर्शाया गया है, जब आकाश में काले बादल छा रहे है।
यह बहुत ही सुंदर और भाव पूर्ण कविता है जो प्रकृति और प्रेम की सुंदरता को दर्शाती है।
सांसारिक जीवन में माँ और बच्चों की अलखेलिया उनकी चंचलता उनके लाड प्यार को इन पंक्तियों में संजोने में पूर्ण प्रयास किया है जिसमें काफी हद तक सफल रही है।
अटखेली सी करता फिरता घुटवन जब चलता।
जब से तुम पाषाण बने कविता में प्रेम और विरह की भावना को बहुत ही गहराई से छुआ है।
मीरा बाई की भक्ति और उनके कृष्ण प्रेम का वर्णन मीरा के दीवानी प्रेम का संजीव वर्णन का अनोखा चित्रण प्रस्तुत किया जो मन को बहुत ही भाव विभोर कर अपनी छवि पाठक के हृदय में उतार दिया हो।
मीरा ने पीकर विष प्याला लोक लाज क्यों खोई।
बन कर तेरी जोगन मीरा सुध बुध अपनी खोई।।
यह पंक्ति हृदय में उतर कर नैनों में कृष्ण प्रेम आँखों में अश्रु धारा बन सजल हो जाए, जो सच्चे प्रेम की पराकाष्ठा का दर्शन करा दिया हो।
पृष्ठ २३ डाल अवगुंठन चली
कोई प्रेमिका अपने प्रीतम से मिलने हेतु लोक लाज से बचने हेतु एक आवरण डाल कर चल रही हो।
जैसे चांदनी ने स्नान कर ताजगी में भरी हुई, चांदनी को देख कर अपनी ड्योढ़ी द्वार बहारने लगती है
चांदनी से लज्जित हो अपने प्रेमी के लिए जो गीत हृदय में थे वह कण्ठ में अवरुद्ध (रुक) गए हो।
कवयित्री ने उर्मिला के विरह वेदना एवम् उसके तपस्या का मनोहर छवि उकेरा है।
विह्वल सी उर्मिला रहती थी पिय के ही घर में।
नटवर कृष्ण मुरारी कविता में कृष्ण के लीलाओं का मनोरम छवि से सुशोभित संयुक्त संयोजन कर अपने सम्पूर्ण भाव पृष्ठ पर उकेर दिया हो।
शांत रस में उद्धृत पंक्तियाँ कृष्ण भक्ति में अपने सभी भाव समेट रही हैं।
नमन करूँ में निर्गुण भक्ति धारा के साथ – साथ सगुण भक्ति का समन्वय का अनोखा ताल मेल प्रस्तुत किया है-
पालन हारे निर्गुण न्यारे, तेरा ध्यान करूँ।
वेद पुराण गुणगान करते, उर में धीर धरूँ।।
नारी का सम्मान कविता में नारी के त्याग भावना एवं देश के सैनिकों के अद्भुत साहस की व्याख्या से सुसज्जित भाव नारी सम्मान एवम् देश के प्रति अपने कर्त्तव्य की सच्ची गाथा बता रही है।
जीवन की धारा का एहसाह भाव से जीवन पथ पर आशाओं में खुशियों को ढूंढता हुआ जीवन पथ पर अग्रसर हो मधुरम संगीत से जीवन सजो ले वहीं अच्छी गृहणी है।
होकर हर पीड़ा मुक्त तभी हृदय खुशी से भर आया।
जोड़ा बंधन जबसे तुमसे गीतों से मन बहलाया।।
नैनों के संवाद मध्य में बाँहो के थे घेरे।
कंपित अधरों की मुस्काने हुए पिया अब मेरे।।
अद्भुत सचित्र वर्णन से संयोजित भाव मानो व्यक्ति पढ़कर अपने पिछली यादों को पुनः अवतरित कर अपने मन की वीणा का झंकृत गीत स्वयं गुन गुनाने लगेगा, प्रथम मिलन की वेला में लय बद्ध ताराम्यता से संयोजित भाव बहुत ही उत्कृष्ठ जान पड़ते है।
प्रेम और विरह की गहराई बयां करती है।
प्रेम की पीड़ा और अनिर्णय की स्थिति को बहुत ही सुंदर तरीके से व्यक्त किया है।
कविता में कई प्रतीक और बिंब हैं जो प्रेम की जटिलता और उसकी गहराई को दर्शाया है –
प्राणपण से निभाया गया प्रेम पर
प्रीति का अवतरण ही नहीं हो सका।।
प्रकृति के प्रतीकों का भी बहुत ही सुन्दर उपयोग किया है जैसे कौमुदी देख मुस्का रही थी वहाँ और मौन चितवन बुला रही जान्हवी।
प्रेयसी छंद में प्रियसी (प्रियतमा) की यादें और उनके आगमन की कल्पना की गई है –
सुरभित यादें आकर बहती अन्तर ताल मौज मनाते।
जो प्रेयसी की यादों के प्रभाव को दर्शाते है।
कविता में रूपक, उपमा, प्रतीक एवम् विरोधाभास अलंकार के पुट विद्यमान है।
रूपक अलंकार नयन झरोखे एवं मन के द्वार
उपमा अलंकार तितली के बच्चे सम पुष्प की चाह
प्रतीक अलंकार सुरभित यादें और अंतर ताल
उदाहरण है जहाँ यादों को सुरभित और अंतर को ताल के रूप में वर्णित किया गया है।
विरोधाभास अलंकार निष्ठुर मौसम और आग लगाए आज
जहाँ मौसम की निष्ठुरता और आग की तपन को कवयित्री ने बहुत ही सुंदरता से सजाया है।
त्याग कर दुष्यंत ने था कब प्रेयसी को था पुकारा।
कल्पना के गाँव में भी कब बना है घर हमारा।।
जीवन धारा से जुड़ कर कवयित्री के भाव मानो कल्पना से सात्त्विकता का पथ साकार करने हेतु उर्मिला और शकुन्तला के विरह वेदना को आज के सामाजिकता से जोड़कर प्रेषित करने का पूर्ण प्रयास किया है जो प्राचीनतम एवं पुनर्जागरण काल का समन्वय का विश्लेषण जान पड़ता है स्त्री पीड़ा को बहुत ही मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है।
कविता ये बंधन मत तोड़ो में राधे कृष्ण के माध्यम से प्रेम भाव की सुंदर व्यंजना सरल भाषा में प्रस्तुत किया है।
भावना मेह की
एक आध्यात्मिक साधिका बन अर्णव के तट झूमते हुए हृदय में भावनाओं के कम्पन बारिश के सदृश्य दर्शाया गया है।
प्रतीकात्मकता एवं प्रकृति परिवेश से सुंदर चित्रण उकेरती है साथ में प्रकृति के माध्यम से स्त्री मन की पीड़ा को बहुत सार्थक रूप से उद्वेलित भाव सरल भाषा में एक सुंदर संयोजन किया है।
मिला सर्व उपहार है
गुरु के महिमा का अनुसरण उनके द्वारा प्राप्त ज्ञान एवम् जीवन के बाधाओं से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ जिसका बहुत ही सरल शब्दों एवम् आम जन भाषा में सरल उल्लेख किया है।
जन्म मरण का प्रश्न कहाँ अब चरण कमल अनुराग।
मोह कहो क्यों इस काया से राधा मन वैराग्य।।
अब जन्म मरण का प्रश्न नहीं है क्योंकि प्रेम(अनुराग) ने चरण कमल (कृष्ण) के चरणों में वास कर लिया है राधा का मन अब इस शरीर से मोह नहीं करता क्योंकि उसका वैराग (विरक्ति) से भर गया है वह कृष्ण प्रेम में डूबी हुई है।
पीत वसन मनमोहन शोभित केसर चंदन भाल।
इन पंक्ति में कृष्ण के सुंदरता का वर्णन है जो पीले वस्त्र पहने हुए उनके माथे पर केसर चंदन का तिलक सुशोभित हो रहा है-
आनन पंकज नेत्र चंचला काले घूंघर बाल।
में कृष्ण के मुख नयन उनके चंचलता एवम् उनके घुंघराले काले केस की सुंदरता बहुत ही अद्भुत चित्रण प्रस्तुत किया है।
राधा के प्रेम भक्ति का सुन्दर अभिव्यंजना प्रकल्पित किया गया है।
पहलगाम आतंकी आत्मघाती हमला कवयित्री को झकझोर सा दिया है उन्होंने अपने काव्य भाव से उन महा पुरुषों की उल्लेख कर बताया है कि हमारी धरती वीरों से खाली नहीं हैं, देश भक्ति से ओजपूर्ण भावभियक्ति शब्द व्यंजना से जागृत किया है भारतीय वर्तमान सैनिकों के साहस के साथ – साथ पूर्वजों के आवाह्न कर बताया है कि यह भूमि योद्धा से रिक्त नहीं हैं यहाँ पृथ्वी राज चौहान एवं ऊदल जैसे सुरमा पैदा हुए हैं।
सबकी राम कहानी में सरल भाषा में सहजता पूर्ण भाव उद्वेलित किया है।
सदा रहो गतिमान में जीवन में अपने पथ पर सदैव बढ़ते रहो संघर्ष से आशाओं का पुष्प पल्लवित कर गुंजयमान किया है।
सावन प्यास जगाए जीवन की विरह पीड़ा का प्रतीकात्मक प्रकृति भाव से सुंदर संयोजन किया है, जिसमें विरोधाभास अलंकार का पुष्ट विद्यमान है।
सांसों की है माला में भक्ति समावेश है तो सुंदर है रचना में माता की व्यंजना का सुन्दर भक्ति प्रस्तुत किया है माँ के लिए जितना लिखा जाए उतना कम है फिर भी कवयित्री ने जो शब्द चुने वह सुंदर पुष्प माँ को समर्पित कर धन्य हो गयी।
सृजन ऐसा करो में बहुत ही उन्मुक्त व्यंजना प्रस्तुत किया है –
अंतिम बंद के तृतीय पंक्ति में टंकण त्रुटि जो कवयित्री या प्रेस की भूल बस भिगो जाए के स्थान पर भिगो जाओ तुकांत का त्रुटि प्राप्त होता है।
स्वप्न साकार में प्रकृति माध्यम से जीवन में संकल्प को राख एवं इच्छा को अंगार बताया है तो मन के भाव में रंग भर कर फिर अपने स्वप्न को साकार करो का आवाह्न किया है।
शून्य पथिक में शून्य से शीर्ष तक की यात्रा पूर्ण करने का सम्पूर्ण प्रयास किया है जिसमें काफी हद तक सफल रही हैं, जिसमें सीता राम, राधा कृष्ण की पराकाष्ठा में शून्य में पूर्ण होने का वरदान प्राप्त कर आत्मा परमात्मा में विलीन होना चाहती है, आत्मा परमात्मा से कहती है कि मुझे अब अपने में मिलाकर मुझे पूर्ण करे यह संसार का माया जाल शून्य है, यह कवयित्री द्वैत एवं अद्वैत दोनों भाव से भक्ति करने में सफल जान पड़ती है।
क्या दृश्य संयोजन किया है बूढ़ा बरगद भी कहता आस्था में विश्वास हो।
आज की पीढ़ी आधुनिक परिवेश में विज्ञान को अपना सर्वत्र मान कर अपने आपको एक धोखा में रख रहा है, उनका अपने धर्म के प्रति आस्था कम होती जा रही है जो भारतीय संस्कृति एवं धर्म पर कटाक्ष कर उन्हें दर किनार कर रहे है जो चिंता का विषय है जिसे कवयित्री ने व्यक्त किया है जिसे काव्य भाव में कहती है कि युवा पीढ़ी तुम जागो अपने बुजुर्गों की बात को अपने जीवन में ग्रहण कर अपने धर्म आस्था के प्रति सचेत हो अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त करो।
हमने देखी है में प्रेम की पूजा का समावेश प्रकल्पित हुआ है।
हुआ उजाला
कविता में ग्रामीण परिवेश से जुड़े प्रकृति समावेश जीवन के पहलू का संजीव चित्रण किया है जो उनकी तीस वर्ष पूर्व अवस्था का दृश्य व्यापक अन्वेषण पुष्टकर ग्रामीण परिवेश को मन में पुनः जागृत कर दिया है, जिससे मालूम पड़ता है कवयित्री ग्रामीण परिवेश से भली भाँति परिचित है जो ग्राम से बहुत ही प्रेम करती है।
मन वह सारथी है जो सदैव अनेक भटकाव का कारण बनता है इसे अपने ज्ञानेंद्रियों द्वारा बस में लाया जाता है।
चंचल मन के माध्यम से भूत के घटनाओं का स्मरण कर एक वर्तमान में कल्पना कर समावेश तैयार कर चंचल मन को संतोष प्रदान करने का भाव प्रेषित किया है।
मैं कोई समीक्षक नहीं हूँ एक छोटा प्रयास किया हूँ।
इस पुस्तक को पढ़कर पाठक जरूर संतुष्ट हो, अपने जीवन में सीख लेगे यह मेरा अनुभव कह रहा है।
जो मेरे विचार में आया उसे समीक्षा में निष्पक्ष भाव से लिखा हूँ अगर इसमें कोई त्रुटि हुई हो तो हमे क्षमा करे।
नवनीत पाण्डेय सेवटा (चंकी)