आपके नज़रो ने देखा...!
. पूर्णिका ००१०
प्रारम्भी नेह:-
झूठ लिखने को वो कहते हैं हमें अखबार में।
तब कहीं जाकर हैं मिलते मान उस दरबार में।।
दे खड़ाऊँ सोने का कहते है अपने सर धरो।
पा सका न कोई अब तक वो मिला उपहार में।।नेह:-१।।
शर्त रखते है हमेशा अपने लायक सोचकर।
चाहते गर्दन झुकाकर रख ले हम उपकार में।।नेह:-२।।
नासमझ बैठे पकड़ सर बन लिए है नासूर वो।
सड़ गया जो दिमाग तो क्या सर कटे उपचार में।।नेह:-३।।
घूँट कड़वे पी के रहना गर वो सच्ची बात हो।
सिर्फ हाँ ही हाँ कहे उसे रखिये ना सरकार में।।नेह:-४।।
चापलूसों से तो बचके रहना कुछ मुश्किल तो है।
हर गली हर चौक जो मिलते नये अवतार में।।नेह:-५।।
हो भरोषा खुद पे खुद का तू सदा काबिल रहा।
तैर लेता हैं जो सागर क्यों डरे वो जलधार में।।नेह:-६।।
जब लहर थी तेज तो भिड़ जाने को आतुर रहा।
अब भँवर है शांत तो तू क्यों फँसा मझधार में।।नेह:-७।।
कर रहे हो अटखेलियां क्यों जान हाथों पर धरे।
बाढ़ का पानी नहीं ये जो खिंच लोगे पतवार में।।नेह:-८।।
परिचयी नेह:-
आपके नज़रो ने देखा जो न देखें “चिद्रूप” को।
जो सरल सा भाव रख करते सृजन रसधार में।।
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©️®️ पूर्णिका-कार :- पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित १०/०९/२०२५)
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