घाव
एक वक्त था जब इंसान को घाव,
इंसान दिया करते थे अब बदल गई हवा।
भगवान ने भी दया को छोड़ दिया,
हिमाचल की वादियों का रुख मोड़ दिया,
बारिश की रिम झीम ने तो इंसानों को ही रौंद दिया।
कैसा तेरा इंसाफ ए मेरे मालिक ,
जो लोगों पर ही नही बे जुबान ,
जानवरों पर भी कहर बनकर बरसा है।
इंसानों में तो माना स्वार्थ भरा पड़ा है
पर उन बे जुबानों का क्या जिन पर तू,
लाठी लेकर खड़ा है।