किसान चलत बा...!
. पूर्णिका ०००९
प्रारम्भी नेह:-
मन मोहे वाला सुंदर बयार चलत बा।
गईल पतझड़ी मौसम बहार चलत बा।।
ओढ़ धानी चुनर लागल धरती लहराए।
संगे खेतवा के नदी क कगार चलत बा।।नेह:-१।।
मेहनत क फल बाटे अबके भेटाईल।
मनवा खेतिहर के हर्ष अपार चलत बा।।नेह:-२।।
भर जाई धन धान से खेत खलिहानवा।
घरे गोभी, चना, छेमी, गवार चलत बा।।नेह:-३।।
धूल धूसरित देह धोई मंडी में जाए के।
रहिया धीरे धीरे ट्रेक्टर सवार चलत बा।।नेह:-४।।
धरती के पूत गबरू बहियाँ फहरा के।
मूंछ अईठत किसनवाँ हमार चलत बा।।नेह:-५।।
दुल्हनियाँ मचले ले पियवा मिलन के।
उठा डोली हाली हाली कहार चलत बा।।नेह:-६।।
बच्चन संग उछलत बुढ़वो जवनका।
देखत बैसाखी मेला कतार चलत बा।।नेह:-७।।
अन्नदाता केहुवे न अइसहीं कहाये।
जिनगी इनकर भरोसे हजार चलत बा।।नेह:-८।।
परिचयी नेह:-
“चिद्रूप” अब का तूँ हूँ कहब केहु से।
तोहार सांस ले इनसे उधार चलत बा।।
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©️®️ पूर्णिका-कार :- पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित १०/०९/२०२५)
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