अधूरी तक़दीर
किसी को भूख है तो रोटी नहीं,
किसी के पास रोटी है तो भूख नहीं।
कहीं सिर ढकने को छत नहीं,
कहीं हवेलियाँ हैं मगर सुकून नहीं।
किसी के पास नींद है मगर बिस्तर नहीं,
कहीं बिस्तर है पर नींद नहीं।
किसी को चाहत है पढ़ाई की मगर किताब नहीं,
किसी के पास किताबें हैं पर लगन नहीं।
कहीं आँखें सपनों से भरी हैं मगर साधन नहीं,
कहीं साधन ढेर हैं मगर आँखों में सपने नहीं।
किसी के पास वक्त है मगर काम नहीं,
किसी के पास काम है मगर वक्त नहीं।
किसी के पास रिश्ते हैं मगर अपनापन नहीं, किसी के पास अपनापन है मगर रिश्ते नहीं।
यही है जीवन का अजीब दस्तूर,
हर किसी की तक़दीर रहती है कुछ ना कुछ अधूरी जरूर।
इसलिए ही संत कह गए सदा,
“संतोष में ही छुपा है जीवन का सच्चा सुख।”
✍🏻 गणपत सिंह ठाकुर