किस नाम से हम पुकारे तुमको
(शेर)- सोच रहे हैं हम तुम्हें क्या नाम दें, इस कशिश को हम क्या मानें।
यारों को खबर है कि हम बेखबर है, इसको हम पागलपन मानें, या मोहब्बत मानें।।
————————————————————-
आते हैं लब पे नाम कई, आते हो नजर तुम जब भी हमको।
मुश्किल यही है सोच में है, किस नाम से हम पुकारे तुमको।।
आते हैं लब पे नाम कई———————।।
तस्वीर हो तुम सुंदरता की, मूरत हो तुम सज्जनता की।
तुझमें नहीं कोई भी दोष, ताबीर हो तुम उज्ज्वलता की।।
दर्पण कहें तुमको जन्नत का या, तहज़ीबे-जमीं-ओ- जहान तुम्हें।
उलझन यही है गुम है हम, किस नाम से हम नवाजे तुमको।।
आते हैं लब पे नाम कई——————–।।
मुस्कान तेरे इन लबों की, मेरे जख्मों के लिए एक मलहम है।
आँखों में झलकती यह मोहब्बत, मेरे नग़मों की एक सरगम है।।
खुशियों की सुबह तुमको कहें या, मौजे- बहारें जीवन की तुम्हें।
उलफत में है, खामोश है हम, किस नाम से हम सँवारें तुमको।।
आते हैं लब पे नाम कई——————–।।
बार बार पर्दे से तेरा निकलना, और यूँ मुखातिब होना हमसे।
आँचल हटाकर अपने सिर से, जुल्फों को फैलाकर चलना ऐसे।।
तुम्हें हीर कहें या नूरे- जहां, या दिल की कहें हम मुमताज़ तुम्हें।
हमें डर यही है और शक यही है, कोई नाम बुरा नहीं लगे तुमको।।
आते हैं लब पे नाम कई———————।।
शिक्षक एवं साहित्यकार
गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला-बारां(राजस्थान)