जाना मुश्किल हुआ
जाना मुश्किल हुआ न जाने क्यूँ
रूक गए खुद कदम न जाने क्यूँ
बैठे-बैठे पता ना चला वक्त का
कौन रखे हिसाब ऐसे में वक्त का
लौट कर भी है जाना भूल बैठे थे हम
रुक गए थे कदम न जाने क्यूँ
बस खोए रहे एक दुजे में हम
कभी जरा पास वो कभी दूर हम
खाते रहे जो पहले ना खाई कसम
रुक गए थे कदम न जाने क्यूँ
ये कैसी पहली मुलाकात थी
कह ना सके लबों पे जो बात थी
भूल बैठे थे जैसे पूरी कायनात हम
रुक गए थे कदम न जाने क्यूँ
हो रहा है दिल-ए-बेकरार क्यूँ
कर सका ना “V9द” इज़हार तूँ
लिखने बैठा चली खुद कैसे कलम
रुक गए थे कदम न जाने क्यूँ