सच व झूठ
ख़ामोश हो जाते हैं,
सच के नुमाइंदे अक्सर
जब ललकारती है उन्हें,
झूठ की फ़ौज एक साथ !
संरक्षित कर रहे हैं वो,
‘झूठे बेमानी रिश्ते’
जहाँ सत्य गौण है और
और झूठों की है बारात !
पोषक बनते रहे वो,
छल-प्रपंच व झूठ के,
रूठ न जाए मित्र कहीं
और छूट न जाए साथ !
सत्य ही शिव है और
शिव सदा से ही सुन्दर है,
न जाने कब समझ आएगी?
उन्हें छोटी सी यह बात !
जीवन क्षणभंगुर है,
कुछ भी नही स्थिर यहाँ,
सबका भला करें ईश्वर,
चाहे कितना दें आघात !
@स्वरचित व मौलिक
कवयित्री: शालिनी राय ‘डिम्पल’
आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश।