आँसू वही...!
. पूर्णिका ०००८
प्रारम्भी नेह:-
कतरा कतरा ई अखियाँ से आँसू बही।
तोहार दुःखवा दरदवा सब आँसू गही।।
जवन हियरा पर तोहरो लगल घाव बा।
ओकर सकले सबुतवा बन आँसू रही।।नेह:-१।।
खून खाकर के चोटवा त जम जायेला।
धोखा खा करके बहे वाला आँसू सही।।नेह:-२।।
केतना दर्द निशानी बन मिलल बा हमें।
हम्मर श्रृंगार दुनिया के ई आँसू कही।।नेह:-३।।
सूखत जाई भले ही पोखरा तालाब सब।
लेकिन अँखिया ठिकाना बन आँसू ठही।।नेह:-४।।
खाली रोअला पे ना खुशियों में आवेला।
कबो बन जाला मोतियो जा आँसू यही।।नेह:-५।।
जवन जीव क दुःख से दुखी होला मन।
ऊहे मनवा सरल ह सच्चा आँसू वही।।नेह:-६।।
परिचयी नेह:-
सागर महला से अमृत त मिलल देव के।
मिली ओके सुधा जे “चिद्रूप” आँसू मही।।
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©️®️ पूर्णिका-कार :- पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित १०/०९/२०२५)
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