ज़िंदगी
ज़िद्द पे अड़ी है यह कैसी मनचली है।
वाह री जिंदगी तू क्या ख़ूब नकचढ़ी है।।
तमाम तरह के सपनों में उलझा के चल पड़ी है।
हमें तो यह किसी तिलिस्म से कम ना लगी है।।
निकल कर हाथों से रेत सी फिसल पड़ी है।
साज़िश की धुँद में संग लपेट के ले चली है।।
तारों की चमक बिखेर के अमावस्या की हो चली है।
हवाओं का रुख़ बदल कर झासा नया दे निकल पड़ी है।।
ऊँची इमारतों सी बैरिन सवाल ले कर आ खड़ी हुई है।
अर्थक्वेक का डर दिखा कर समीक्षा करने पे वो डटी है।।
वाह री ज़िंदगी तू क्या ख़ूब नकचढ़ी है।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”