Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
11 Sep 2025 · 1 min read

वेदनाओं की कहानी, कह रही थी द्रौपदी

वेदनाओं की कहानी
कह रही थी द्रौपदी।

लक्ष्य भारी भेदकर के
पार्थ ने जीता स्वयंवर।
बाँट डाला था नियति ने
पाँच पतियों में परस्पर।

भाग्य को सच मानकर ही
रह रही थी द्रौपदी।

जब जुएँ में हारकर के
दाँव पर उसको लगाया।
वस्त्र उसके फिर उतारे
चीर कान्हा ने बढ़ाया।

स्वामियों के सामने ही
ढ़ह रही थी द्रौपदी।

राजमहलों से निकाला
पथ विषम वनवास भोगा।
और उसने हर कदम पर
श्राप सा संत्रास भोगा।

कष्ट जीवन में अनेकों
सह रही थी द्रौपदी।

वक्ष रिपु का चीर डाला
भीम ने मदमस्त होकर।
पूर्ण प्रण कर द्रौपदी ने
रक्त से निज केश धोकर।

ज्वाल में प्रतिशोध की
दह रही थी द्रौपदी।

राजेश पाली ‘सर्वप्रिय’

Loading...