"तू रूह–रूह सी"
“तू रूह–रूह सी”
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तू रूह–रूह सी बनके, मेरे दिल में उतर गई।
तू ख़्वाब–ख़्वाब सी बनके, पलकों पे ठहर गई।।
तेरे बिना धड़कन सूनी, बाजे न वीना,
तेरे बिना सरगम सूनी, राग है सूना।
तेरे बिना सरिता सूनी, सागर है सूना,
तेरे बिना लहरें सूनी, डूबे सफीना।।
तू हर्फ़–हर्फ़ सी बनके, नग़्मों में उतर गई।
तू बोल–बोल सी बनके, गीतों में मुखर गई।।
तेरा नाम लूँ तो अंबर ये गाए,
तेरे संग–संग चलूँ, जहाँ झूम जाए।
तेरी इनायत करूँ, तेरी इबादत करूँ,
तू ही बन जाए दुआ, रब तू हो जाए।।
तू लफ़्ज़–लफ़्ज़ सी बनके, होठों पे ठहर गई।
तू सतर–सतर सी बनके, आयत में उतर गई।।
मैं बुन रहा हूँ ख़्वाब चाँदनी के,
मैं सज रहा हूँ तेरी रौशनी से।
क़दमों के तेरे निशाँ राह मेरी बन गए,
मैं चल पड़ा हूँ मंज़िल के पथ पे।।
तू बर्क़–बर्क़ सी बनके, फ़लक़ों पे बिखर गई।
तू नूर–नूर सी बनके, आरत में दहर गई।।
–कुँवर सर्वेंद्र विक्रम सिंह✍️
*यह मेरी स्वरचित रचना है
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