झारखंड गाथा
मनु के श्लोकों में दर्ज है
झारखंड की जीवन-रीति,
धातु के पात्रों में जल,
शाल-पत्तों पर भोजन,
खजूर की चटाई पर नींद
यही तो है सादगी का सौंदर्य।
झाड़ों और अरण्यों की गोद में
जनता ने सीखा जीना,
शब्द ही बने नाम
“झारखंड” झाड़ियों वाला प्रदेश,
धरती जहाँ जंगल ही पहचान हैं।
पुराणों की पंक्तियाँ कहती हैं
कभी मुरण्ड, कभी मुंड,
कभी पुंडरीक देश,
कभी कलिंद की धरती।
फाह्यान ने लिखा “कुक्कुटलाड”,
युआन च्यांग ने देखा
वनों और पहाड़ियों का यह साम्राज्य।
हीरों और सोने की गवाही देती
खोखरा देश की धरती,
जहाँ जरासंध हारों को छोड़ देता था
वन्य पशुओं की भूख में।
मुगल काल में,
अकबरनामा में,
इम्पीरियल गजेटियर में
बार-बार दर्ज हुआ नाम,
झारखंड
जंगलों का साम्राज्य,
रास्तों का संगम,
ओड़िसा, मध्यप्रदेश,
उत्तरप्रदेश और बिहार को जोड़ता
महामार्ग।
इतिहास की लकीरों पर लिखा है
शेरशाह की लड़ाई भी
यहीं के पथों के लिए हुई थी।
नरसिंह देव के शिलालेख में
झलकते हैं दक्षिण झारखंड के अक्षर,
तो कभी बहमनी सुलतान
स्वयं को झारखंडी शाह कहता है।
यहाँ के राजा कहलाते “झारखंडी”,
यहाँ की नदियाँ गातीं
वन और मिट्टी का गीत,
यहाँ के जन-समूह
देवताओं से जुड़ते
बाबा बैद्यनाथ के चरणों से।
सुलतानगंज से देवघर तक
गंगा का पवित्र जल ढोते
काँवरिए,
हर सावन
दो राज्यों की सीमाएँ लांघ
एक महादेव में मिल जाते।
इतिहास से वर्तमान तक
झारखंड रहा है
सांस्कृतिक धारा का संगम।
कभी विशाल भूभाग,
कभी सिमटी सीमाएँ,
पर आत्मा वही
वनों की, शाल-पर्णों की,
खनिजों की, असुरों की,
आदिवासी गीतों की,
माटी और महादेव की।
झारखंड,
अब केवल भूगोल नहीं,
बल्कि पहचान है
धरती और मनुष्यता की
सच्ची साझेदारी की।
उत्तर में बिहार की स्मृतियाँ,
पश्चिम में उत्तरप्रदेश
और छत्तीसगढ़ की साँसें,
दक्षिण में ओड़िशा का गीत,
पूर्व में पश्चिम बंगाल की
धड़कन बीच में
छोटानागपुर का पठार,
जिसकी नदियाँ
कोयल, दामोदर,
खड़कई, सुवर्णरेखा
धरती को सींचती हैं,
और स्वर्णरेखा के जल में
चमकता है इतिहास का सोना।
अनोखा है यह राज्य
भाषाओं की विविधता,
संस्कृतियों का मेल,
धर्मों का संगम।
यहाँ द्रविड़ हैं, आर्य हैं,
आस्ट्रो-एशियाई भी हैं
मिट्टी ने सबको
एक ही गीत में बाँध लिया है।
राँची का पठार,
हजारीबाग की ऊँचाई,
राजमहल की पहाड़ियाँ,
मैदान और घाटियाँ
धरती चार टुकड़ों में बँटी,
पर आत्मा एक।
जनजातियाँ
यहाँ की धड़कन हैं।
मुंडा, संताल, उराँव,
खड़िया, हो, गोंड़,
असुर, पहाड़िया, भूमिज
कुल बत्तीस समूह,
जो जंगलों की महक,
नृत्यों की लय,
ढोल-नगाड़ों की गूंज में
अपनी अस्मिता गढ़ते हैं।
गुमला में सबसे अधिक,
लोहरदगा और पश्चिम सिंहभूम में
जीवन की आधी कहानी,
राँची और पाकुड़ में
जनपद की आत्मा।
कुछ जिलों में गिनी-चुनी,
तो कहीं
हर खेत, हर घर, हर गीत में
बसती है जनजातीय छवि।
शिकार और खेती,
लोकगीत और परब,
सरहुल का फूल,
करमा का नृत्य,
और पहाड़ों में गूंजते
मांदर के स्वर
यही हैं झारखंड की सांसें।
यह राज्य केवल भूगोल नहीं,
यह संस्कृति का उत्सव है।
खनिज की खदानें,
वनों का विस्तार,
देवघर का बाबा धाम,
आदिवासियों का गान
सब मिलकर कहते हैं
झारखंड
धरती का वह अंश है
जहाँ इतिहास, प्रकृति
और मानवीय जिजीविषा
एक हो जाती है।
झारखंड
जहाँ हर कदम ताल है,
हर शब्द गीत है,
और हर साँस में छिपा है
नृत्य का जादू।
अखरा में जब ढोल बजता है,
मांदर की थाप
धरती की धड़कन बन जाती है।
यहाँ दर्शक और कलाकार
दो अलग दुनिया नहीं
वे सब एक हैं,
एक लय, एक स्वर, एक जीवन।
गीतों की प्रधानता
यहाँ नृत्य बिना गीत अधूरा है।
राग और ताल
मुद्राओं में ढलकर
ऋतु का चक्र रचते हैं।
फगुआ की रंगत हो,
ओरजापी का उल्लास,
डोमकच का सामूहिक मेल,
या करमा की रात का परब
हर गीत में
पुरखों की स्मृति बोलती है।
भाषा चाहे जो हो,
शब्द चाहे समझ में आएं या नहीं,
पर जब झूमर गूंजता है,
जब अधरतिया में स्वर उठते हैं,
तो आत्मा खुद-ब-खुद
नाचने लगती है।
वाद्ययंत्रों की दुनिया
नगाड़ा गर्मी में सबसे मुखर,
सर्दी में मौन-सा,
मांदर—जिसकी थाप
सीधे दिल से बात करती है।
ढक, धमसा, दमना,
बंसी, शंख और करहा
जंगलों की गूँज को
संगीत में ढाल देते हैं।
ये वाद्ययंत्र
सिर्फ संगीत नहीं,
प्रकृति के साथ संवाद हैं।
नृत्य में जीवन की झलक
कभी युद्ध की मुद्राएँ,
कभी पशु-पक्षियों की चंचलता,
कभी खेत में काम करती
महिलाओं की भंगिमा
सब उतर आते हैं
छऊ के मंच पर।
यह नृत्य केवल कला नहीं,
यह लोक शिक्षा है,
प्रकृति का पाठ है,
पौराणिक कथाओं का रंगमंच है।
उत्सवों का उत्सव
सरहुल
साल के फूलों का प्रणाम,
भाईचारे का प्रतीक।
टुसू
लड़कियों का गीत और पूजा,
फसल की खुशी में रचा गया।
सोहराय, करमा, मगही पूजा,
बजरा परब और
बुद्धा बाबा हर पर्व में
नृत्य ही आराधना है।
झारखंड के नृत्य
सिर्फ मनोरंजन नहीं,
यहाँ यह जीवन है।
जंगल का श्वास है,
धरती का स्पंदन है,
जनजातीय आत्मा का
अनंत गीत है।
झारखंड की चित्रकला
रंगों में साँस लेती संस्कृति
झारखंड
जहाँ दीवारें बोलती हैं,
जहाँ मिट्टी रंगों में घुलकर
जीवन की कहानियाँ कहती है।
जादोपटिया
पट पर अंकित मिथक,
संताल समाज की स्मृतियाँ,
लाल, पीला, हरा, काला
और भूरे रंग की परतों में
संस्कृति का गीत।
हर चित्र एक कथा,
हर रेखा एक विश्वास।
वह कला जो कभी वंशानुगत थी,
आज लुप्तप्राय होकर भी
धरती की आत्मा में बची है।
संताली चित्रकला
दीवारों पर फूल, पत्तियाँ, लताएँ,
मोर और मछली की जोड़ी,
गमले से उठते पौधे,
जो दरवाजों की चौखट से
मिल जाते हैं जैसे घर भी
प्रकृति से आलिंगन करता हो।
सफेद खड़िया की रेखाएँ,
नीला, लाल, हरा, पीला रंग
समतल और उभरी हुई आकृतियाँ
सिर्फ सजावट नहीं,
यह तो जीवन का सौंदर्यबोध है।
ज्यामितीय आकृतियाँ
वृत्त, अर्धवृत्त,
लहरियाँ, आयताकार,
रेखाओं की गत्यात्मकता
मानो गणित भी
यहाँ कला बन गया हो।
कोहबर और सोहराय
छोटानागपुर की
दो ज्योतिर्मयी कलाएँ कोहबर
गुफा और विवाह का प्रतीक,
नारी के हाथों से उकेरी गई
फूल-पत्तियों और नारी प्रतीकों की
अलौकिक भाषा।
सोहराय
दीपावली के अगले दिन
जब घर की दीवारों पर
पशुपति की छवि उभरती है,
सांड की पीठ पर खड़े देवता
और जंगल की वन्य दुनिया
रंगों में खिल उठती है।
हजारीबाग की गुफाएँ
आज भी चुपचाप
इतिहास की साक्षी हैं।
चट्टानों पर अंकित आकृतियाँ
कहती हैं
कला सिर्फ सजावट नहीं,
यह मनुष्य की
पहली भाषा है।
आज भी औरतें
मिट्टी से रंग बनाती हैं,
दीवारों पर जीवन रचती हैं,
और दुनिया को बताती हैं
झारखंड की कला
सिर्फ परंपरा नहीं,
यह आत्मा का शाश्वत उत्सव है।
झारखंड की धरती
हरियाली से ढकी,
पहाड़ों और जंगलों में बसी
आदिवासी आत्मा
पर इतिहास में
यह धरती
विद्रोह की ज्वाला से भी दहकी।
तिलका मांझी
उठे तिलका,
जंगल से भेजा गया संदेश
सखुआ का पत्ता घूमता था
गांव–गांव,
लड़ाई का आह्वान करता।
भागलपुर की फांसी पर लटकते हुए भी
तिलका के तीरों की चुभन
अंग्रेजी शासन को सताती रही।
छोटानागपुर
जहाँ सिंदराय और बिंदराय मानकी ने कहा,
“अब और नहीं सहेंगे अत्याचार।”
लगान बढ़ा,
बेगारी ने पीठ तोड़ी,
महाजनों ने गुलामी लिखवा ली
सेवक–पट्टों पर।
और जब न्याय की चौखट से
न्याय गायब हुआ
तो जंगलों ने विद्रोह रच दिया।
नगरी गाँव ने
आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी।
गीत आज भी गूंजते हैं वहां
जहाँ पूर्वजों का लहू मिट्टी में मिला है।
सिद्धू, कान्हू, चांद, भैरव
चार भाइयों ने
फूलो झानो बहनों ने
संपूर्ण संथाल परगना
को जगा दिया।
महाजनों का कर्ज,
साहूकारों की जंजीर,
जमीन पर कब्ज़ा,
गुलामी का बोझ
इन सबके खिलाफ
उठी संतालों की गर्जना।
तालडांगा से लेकर गंगा के तट तक
जली आग,
जिसे बुझाने को
अंग्रेजों को हजारों सैनिक
भेजने पड़े।
हजारों संताल मरे,
पर उनकी आत्मा से
संताल परगना का निर्माण हुआ।
रोहिणी गाँव से
उठी चिंगारी
रांची, पलामू, पोड़ाहाट,
हर जगह फैल गई।
विश्वनाथ शाहदेव, गणपत राय,
माधे सिंह, जयमंगल पांडेय,
नीलाम्बर–पीताम्बर,
शेख भिखारी
एक–एक कर
फांसी पर चढ़े।
नीम के पेड़ों पर
शव झूलते रहे,
पर झारखंड की आत्मा
झूलते हुए भी जीवित रही।
जमींदारी, लगान, धर्मांतरण के विरुद्ध
सरदारों ने कहा
“अब अपना राज्य चाहिए।”
मुंडा–उरांवों ने
कर देना बंद किया,
और स्वशासन की आवाज
जंगल–पहाड़ों में गूंजी।
फिर आया उलगुलान।
बिरसा ने कहा
“अंग्रेजों, अपने देश लौट जाओ।”
उन्होंने लगान ठुकराया,
शोषण को ठुकराया,
और रची
आदर्श समाज की कल्पना।
डोम्बारी पहाड़ी पर
हजारों क्रांतिकारी गिरे,
बिरसा पकड़े गए,
जेल में पचीस बरस की उम्र में
शहीद हो गए।
पर उनकी गूँज अब भी है
हर गीत, हर नारे में।
जतरा उरांव ने उठाई मशाल।
उन्होंने कहा
“जमीन ईश्वर की है,
हम लगान नहीं देंगे।”
शराब–मांस त्यागे,
रंगीन कपड़े त्यागे,
सादा जीवन चुना।
गांधी के चरखे से
खादी अपनाई।
और स्थानीय आंदोलन
राष्ट्रीय धारा में मिल गया।
यह संघर्ष सिर्फ़
अंग्रेजों से नहीं था,
यह संघर्ष था
अन्याय से,
अत्याचार से,
शोषण से।
यह संस्कृति की
रक्षा का युद्ध था,
लोकतांत्रिक
स्वशासन का स्वप्न था।
आज जब हम
झारखंड का नाम लेते हैं,
तो यह सिर्फ़ राज्य का नाम नहीं
यह है सदियों का विद्रोह,
हजारों बलिदानों की मिट्टी,
और उस मिट्टी से उठी
स्वतंत्रता की सुगंध।
वे जंगल से निकले
साल, सखुआ और
महुआ की गंध लिए,
उनके कदमों में
ढोल नगाड़ों की थाप थी
और आँखों में
धधकता हुआ सपना
अपनी मिट्टी पर
अपना हक।
वे जानते थे
लकड़ी सिर्फ लकड़ी नहीं,
धरती सिर्फ खेत नहीं,
नदी सिर्फ पानी नहीं
ये सब जीवन हैं,
ये सब अस्मिता हैं।
उन्होंने देखा
कैसे बाहर से आये लोग
उनकी मिट्टी को नापा-तौला,
खदानों में
धरती की छाती चीर दी,
खून-पसीने को मुनाफे में बदल दिया।
उन्होंने महसूस किया
कैसे कानून बनाकर
पानी, जंगल और जमीन
उनसे छीने गये।
आंदोलनकारी
सिर्फ नारेबाज नहीं थे,
वे अपनी हड्डियों में
इतिहास का दुख ढोते थे।
तिलका मांझी का तीर
उनकी नसों में गूंजता था,
सिद्धो-कान्हू की हुंकार
उनके कंठ से निकलती थी,
बिरसा का उलगुलान
उनकी छाती में
जलती हुई आग था।
वे जानते थे
शहर की सत्ता
कभी जंगल की
भाषा नहीं समझेगी,
पर वे बोलते रहे,
धरना देते रहे,
जेल जाते रहे,
अपना लहू बहाते रहे।
क्योंकि यह सिर्फ
राज्य की मांग नहीं थी
यह पहचान का सवाल था,
भाषा, संस्कृति और
अस्तित्व का सवाल था।
झारखंड आंदोलनकारी
अपने पसीने से लिखते रहे
झारखंड का नक्शा।
उनकी थकान में भी
आशा की हरियाली थी,
उनकी चुप्पी में भी
तैयारी का शोर था।
आज जब झारखंड
एक राज्य बनकर खड़ा है,
तो उसकी मिट्टी पूछती है
क्या हम भूल सकते हैं
उन आंदोलनकारियों को
जिन्होंने हमारे लिए
जेल की सलाखों को तोड़ा,
जिन्होंने अपने सपनों को
हथियार बनाया,
जिन्होंने हमें सिखाया
कि जंगल का आदमी
कभी हारता नहीं,
बस लड़ाई लंबी होती है।
झारखंड…
तू हरियाली की गोद है,
खनिजों का खजाना है,
नदियों और झरनों की लोरी है।
तेरे सीने पर
सोना, कोयला, लौह और अभ्रक की
चमक बिखरी हुई है,
फिर भी तेरे घर
अंधेरे में डूबे हैं।
तेरी धरती से
निकला कोयला
दिल्ली–बंबई की
फैक्ट्रियों में जलता है,
तेरे झरनों से बहे पानी से
दूसरे राज्यों की
बत्तियाँ जगमगाती हैं,
पर तेरे गाँवों में
दीया जलाने को भी तेल नहीं।
तेरे बेटे
ईंट भट्टों की भट्ठी में
अपने बचपन की राख छोड़ आते हैं।
तेरी बेटियाँ
दूसरे शहरों की गलियों में
मज़दूरी के नाम पर
अपना सपना बेच आती हैं।
तेरे युवा
या तो बंदूक थाम लेते हैं
नक्सल बनकर,
या रोटी की तलाश में
पलायन कर जाते हैं।
तेरी पहाड़ियाँ
माफ़ियाओं के
हथौड़े से टूट रही हैं,
तेरे जंगल
आरी से कराह रहे हैं,
तेरी नदियाँ
बांधों के बोझ से
अपना रास्ता भूल रही हैं।
जिन्होंने सत्ता पाई
वे भी तेरे नहीं रहे।
वे भरते रहे
अपनी जेबें,
खाली छोड़ते रहे
तेरा अन्न भंडार,
तेरी झोपड़ियाँ,
तेरे स्कूल।
झारखंड…
तेरी मिट्टी में खून है,
तेरे गीतों में प्रतिरोध है,
तेरी आत्मा में विद्रोह है।
तू रोती है
पर आँसू में भी
एक ललकार छिपी है।
आज तू गरीब है
पर तेरी गरीबी
तेरी नियति नहीं,
तेरी लूट
तेरी पहचान नहीं।
तेरे जंगल
फिर गवाही देंगे,
तेरे पहाड़
फिर हुंकार भरेंगे,
तेरे बेटे-बेटियाँ
फिर कहेंगे
“यह धरती हमारी है,
हमारे सपनों की है,
हमारे लहू से सींची गई है।”
और उस दिन
सोज़-ए-झारखंड
गीत नहीं रहेगा,
क्रांति का घोष बनेगा।
© अमन कुमार होली