मुक्तक
हुनर मुझ में नही था,
देखने का,
तेरी मदहोश आंखों को,
डूब जाता अगर ये ऐब,
पहले से कहीं होता।
अभी तो सिर्फ अंगड़ाई ,
मिली थी मेरे यौवन को,
शाख से फूल चुनने का,
फिर ये मौका कहां मिलता ।
शिकन देखी,
तुम्हारे होठ की लाली उड़ी देखी,
तुम्हारे ख्वाब में खोकर,
तुम्हारी राह भी देखी।
मगर दिल में छुपे अहसास को,
किंचित नहीं समझा,
यही है रीत दुनिया की,
इसे हम भी समझते है,
मगर फिर से कहीं शुरूआत का मौका कहां मिलता।
✍️अमित मिश्र