मनाईं की ना...!
. पूर्णिका ०००५
प्रारम्भी नेह:-
आपन दुःखवा दरदवा बताईं की ना।
रुसल किस्मत के बोल मनाईं की ना।।
जबरन सभवा मे लोगवा हँसेला काहें।
संगे उनकर हम मनवा हँसाईं की ना।।नेह:-१।।
खेले-कूदे में तेज पढ़े-लिखें में फेल।
अइसन लईका के आगे पढ़ाईं की ना।।नेह:-२।।
ई रोजगारीया में मनवा लागत नईखे।
गिन-गिन के ई चील्लर कमाईं की ना।।नेह:-३।।
अँखिया मूँद भरोषा ई सब पर करे।
कउनो चलबाज़ ऐके फ़साईं की ना।।नेह:-४।।
बतीये बतीये में अपमान करे ला ऊ।
अइसन थेथर मरदवा पिटाईं की ना।।नेह:-५।।
रिश्ता अपनन से रखब न मेल जोल के।
दुनियाँ आगे जा तोहके भुलाईं की ना।।नेह:-६।।
परिचयी नेह:-
रतिया रतिया भर लऊके सपनवा में जे।
ओके जिनगी में “चिद्रूप” बसाईं की ना।।
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©️®️ पूर्णिका-कार :- पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ०९/०९/२०२५)
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