तुझको मेरा हो नमन...!
. पूर्णिका ०००४
प्रारम्भी नेह:-
हे देश के सपूत मेरे तुझसे ज़िंदा जो वतन।
करता हूँ मैं भक्ति तेरी तुझको मेरा हो नमन।।
तू है रक्षक माँ का बेटा भारती का सपूत तू।
तुझसे महके देश मेरा घर मुहल्ला ओ चमन।।नेह:-१।।
है शक्ति के अवतार सैनिक भक्ति इनमें है मेरा।
दिनरात ऐसे साहसों का करता हूँ मैं तो मनन।।नेह:-२।।
मौत को स्वीकार करते हँसते हँसते कैसे तुम।
ओढ़ कर दामन तिरंगा करते कैसे वो शयन।।नेह:-३।।
हम रहे खुशहाल इनकी सोच है इतनी बड़ी।
छोड़ खुशियाँ कैसे कष्टों को किये हैं यो सहन।।नेह:-४।।
एक बच्चा जो कि घर भर का दुलारा पूत था।
क्या हौसला जो देश सेवा का कहे कर लो चयन।।नेह:-५।।
परिचयी नेह:-
बात एक बतलाओ “चिद्रूप” पूछता है मन मेरा।
छोड़ घर जाते समय क्यों न भींगोते रो नयन।।
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©️®️ पूर्णिका-कार :- पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ०९/०९/२०२५)
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