हँसावल कर...!
. पूर्णिका ०००२
प्रारम्भी नेह:-
मत अइसे गरीबन के सतावल कर।
जा दुखियन के खूबे हँसावल कर।।
चाहत बाड़ जे मेवा पाई भगवान से।
इनकर सेवा में मनवा लगावल कर।।नेह:-१।।
बाटे मिलल जे तोहके धन धान त।
कुछ दानों में जाकर लुटावल कर।।नेह-२।।
कहीं चादर चढवला से का फायदा।
कउनो नंगा के कपड़ा दियावल कर।।नेह:-३।।
तू न भंडरा खिचड़ी क बाँट सही।
पर भुखन के रोटी खियावल कर।।नेह:-४।।
भलहीं तीरथ कर चाहे वरत कर।
संगे सेवा धरम भी निभावल कर।।नेह:-५।।
चाहे ऊटी घूर चाहे शिमला घूम।
निर्धनवों क मड़ई छवावल कर।।नेह:-६।।
मिल जाये जे तोहके भूलल पथिक।
ओके घरवो जरूर पहुँचावल कर।।नेह:-७।।
मानत बानी की ताकत बहुते बाटे।
न निरिहन के अइसे डरावल कर।।नेह:-८।।
परिचयी नेह:-
बाटे दुनियाँ में खुशियां बहुते भरल।
ईहे “चिद्रूप” तू सबके बतावल कर।।
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©️®️ पूर्णिका-कार :- पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ०८/०९/२०२५)
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