कौए
रखा है छत पर
छप्पर पर
खपड़े पर
जिसकी जितनी ताकत थी
थोड़ा सा खाने को
पितृपक्ष में
अपने पितरों के लिए
जिन्हें जीते जी
शायद तड़पना भी पड़ा होगा
बुढ़ापे में
अपनी इच्छा के भोजन के लिए
शायद दुत्कारे भी गये होंगे
संतानों के द्वारा
आत्मा रोयी होगी
मुस्कुराती आँखों के पीछे
कौए क्यों आएँगे
छत पर
छत सूना है
उन्हें सब पता है
क्रुद्ध हैं सभी
खाने के बाद नहीं चाहते
उलाहने और ताने
बुद्धिजीवी कौए भी।
–अनिल मिश्र