सुबह भरी हो ताजगी, निशा मिले विश्राम।
सुबह भरी हो ताजगी, निशा मिले विश्राम।
मनहर दिनचर्या रहे, धरा लगे फिर धाम।।
वंदन प्रातः में करें, मात पिता गुरु ईश।
जिनके ही आशीष से, मान रखे यह शीश।।
सादर सबसे जो मिले, रखकर शुद्ध विचार।
प्रभु भी करते हैं कृपा, सफल करे आसार।।
वचन कर्म मन सम सदा, रखकर प्रभु में नेह।
रहता जो भी है यहाँ, उसका पावन गेह।।
सरल सौम्य भाषा सहज, मिलनसार व्यवहार।
“पाठक” सुमिरन ईश का, करता बारंबार।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)