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9 Sep 2025 · 1 min read

बाल कविता

सूरज दादा
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सुबह-सुबह जब रवि की किरणें,
धरती पर आ जाती हैं।
रजनी तम के पंख समेटे,
नभ में लाली छाती है।।

खगकुल वृन्द कोलाहल करते,
चिड़ियाॅं गीत सुनाती हैं।
भॅंवरे गुन-गुन गुन-गुन करते,
कलियाॅं भी मुस्काती हैं।।

नई उमंगें ने नई तरंगें,
नई ऊर्जा है मिलती।
फसलों को देते नव जीवन,
जिससे यह सृष्टि चलती।।

वसुधा पर सबके जीवन का,
ख्याल रखें सबसे ज्यादा।
इसीलिए हम बड़े प्यार से,
कहते हैं सूरज दादा।।

~राजकुमार पाल (राज) ✍🏻
(स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)

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