इंसा में सदाकत कितनी है बाजार में अक्सर दिखती है
इंसा में सदाकत कितनी है बाजार में अक्सर दिखती है
सिक्कों में खनक गर हो तेरी हर चीज यहां पर बिकती है
कश्ती से मरासिम अपना तो बस साहिल तक महदूद रहा
कश्ती के थकन के किस्से तो दरिया की मौज ही लिखती है
बूंदें हैं अलग नदियां हैं अलग तौहीद से खाली लोगों को
हक़-बीनी गर हासिल हो तो बूंदों में नदियां बहती है
मैं नाजुक फूल नहीं हूं जो बिन बरखा के मुरझा जाऊं
मैं नागफनी जो सहरा के अंगारों में ही खिलती है
ये मन की दुनिया है बाबा इसकी तो बाते न्यारी हैं
आकाश भी इसको थोड़ा पर नुक्ते में फिट हो सकती है
हम तो शहरों के वासी हैं जंगल से अपना क्या रिश्ता
पिंजरे की मैना जंगल से खत और किताबत रखती है