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8 Sep 2025 · 1 min read

इंसा में सदाकत कितनी है बाजार में अक्सर दिखती है

इंसा में सदाकत कितनी है बाजार में अक्सर दिखती है
सिक्कों में खनक गर हो तेरी हर चीज यहां पर बिकती है

कश्ती से मरासिम अपना तो बस साहिल तक महदूद रहा
कश्ती के थकन के किस्से तो दरिया की मौज ही लिखती है

बूंदें हैं अलग नदियां हैं अलग तौहीद से खाली लोगों को
हक़-बीनी गर हासिल हो तो बूंदों में नदियां बहती है

मैं नाजुक फूल नहीं हूं जो बिन बरखा के मुरझा जाऊं
मैं नागफनी जो सहरा के अंगारों में ही खिलती है

ये मन की दुनिया है बाबा इसकी तो बाते न्यारी हैं
आकाश भी इसको थोड़ा पर नुक्ते में फिट हो सकती है

हम तो शहरों के वासी हैं जंगल से अपना क्या रिश्ता
पिंजरे की मैना जंगल से खत और किताबत रखती है

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