#गज़ल...
#गज़ल…
कोई अनबन।।
(प्रणय प्रभात)
*बड़ी अड़चन उधर भी है इधर भी है।
कोई अनबन उधर भी है इधर भी है।।
*जो पूछा हाथ रख के दिल ये बोला।
बिलखता मन उधर भी है इधर भी है।।
*खड़े हैं पांव हद में कह रही आँखें।
ये दंडक वन उधर भी है इधर भी है।।
*लहू का रंग, नाड़ी और सांसें तक।
वहीं धड़कन उधर भी है इधर भी है।।
*जलाती धूप में लू के थपेड़े उफ़।
सुलगता तन उधर भी है इधर भी है।।
*हवा से कांपती दीवार का सच ये।
कोई आंगन उधर भी है इधर भी है।।
*बुढ़ाती आस के विश्वास पर सच में।
चकित यौवन उधर भी है इधर भी है।।
*न कुछ कहने न करने को बचा है।
निकम्मापन उधर भी है इधर भी है।।
संपादक
न्यूज़&व्यूज
श्योपुर (मप्र)