कपड़ों से किरदार बनाते फिरते हो
क्या क्या तुम सरकार बनाते फिरते हो
कपड़ों से किरदार बनाते फिरते हो
जिन लोहे से खेती के औज़ार बनें
उनसे तुम तलवार बनाते फिरते हो
वो चिंगारी जिसको बुझाते हम लेकिन
उसको तुम अंगार बनाते फिरते हो
आपस में लड़वा कर भाई भाई को
नफ़रत की दीवार बनाते फिरते हो
बिकते हैं ईमान जहाँ पर लोगों के
ऐसी तुम बाज़ार बनाते फिरते हो
मुफ़लिस को तो और धकेलो ग़ुरबत में
धनवानों को जरदार बनाते फिरते हो
जनता है ख़ुशहाल कागज़ों पर प्रीतम
केवल तुम अख़बार बनाते फिरते हो
प्रीतम श्रावस्तवी