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8 Sep 2025 · 1 min read

कपड़ों से किरदार बनाते फिरते हो

क्या क्या तुम सरकार बनाते फिरते हो
कपड़ों से किरदार बनाते फिरते हो

जिन लोहे से खेती के औज़ार बनें
उनसे तुम तलवार बनाते फिरते हो

वो चिंगारी जिसको बुझाते हम लेकिन
उसको तुम अंगार बनाते फिरते हो

आपस में लड़वा कर भाई भाई को
नफ़रत की दीवार बनाते फिरते हो

बिकते हैं ईमान जहाँ पर लोगों के
ऐसी तुम बाज़ार बनाते फिरते हो

मुफ़लिस को तो और धकेलो ग़ुरबत में
धनवानों को जरदार बनाते फिरते हो

जनता है ख़ुशहाल कागज़ों पर प्रीतम
केवल तुम अख़बार बनाते फिरते हो

प्रीतम श्रावस्तवी

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