रिश्ते
अनभिज्ञ नहीं हूँ मैं
अपने अंदर के अंधकार से
जिसका अहसास मुझे
मेरे जलते रिश्तों ने कराया
खून के अपनों ने
प्रतिपल योजनाबद्ध तरीके से
हृदय में अंधकार कर दिया
रोशनी निगलकर
छटपटाता रहा मैं
गहन अंधकार में
विलाप करते,बिलखते जीवन में
निश्छल अनुराग लिए
कुछ मित्र आये
आत्मा अपने प्रकाश को समझ पायी
आलोकित आत्मा
सौभाग्य की राह पर
बढ़ सकी
अनभिज्ञ आज भी नहीं हूँ मैं
जानता हूँ
मित्र ही रिश्ते हैं
और रिश्ते
अविजित शत्रु।
–अनिल मिश्र