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8 Sep 2025 · 1 min read

रिश्ते

अनभिज्ञ नहीं हूँ मैं
अपने अंदर के अंधकार से
जिसका अहसास मुझे
मेरे जलते रिश्तों ने कराया
खून के अपनों ने
प्रतिपल योजनाबद्ध तरीके से
हृदय में अंधकार कर दिया
रोशनी निगलकर
छटपटाता रहा मैं
गहन अंधकार में
विलाप करते,बिलखते जीवन में
निश्छल अनुराग लिए
कुछ मित्र आये
आत्मा अपने प्रकाश को समझ पायी
आलोकित आत्मा
सौभाग्य की राह पर
बढ़ सकी
अनभिज्ञ आज भी नहीं हूँ मैं
जानता हूँ
मित्र ही रिश्ते हैं
और रिश्ते
अविजित शत्रु।
–अनिल मिश्र

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