रहिए संतन संग में, जहाँ मिले संस्कार।
रहिए संतन संग में, जहाँ मिले संस्कार।
दोष मुक्त हो अंत में, हो जाते भवपार।।
करिए इच्छा का दमन, अंतहीन संसार।
जीव नेह के संग में, होता है उद्धार।।
सादर सबको देखिए, यही धर्म का सार।
सबके हित में जो लगा, मिलता जग में प्यार।।
ईश अंश है जीव सब, इतना करें विचार।
कलुष भावना त्यागिए, करें सत्य स्वीकार।।
ध्यान रखें निज कर्म का, व्यथित न हो संसार।
“पाठक” उत्तम है यही, जीवन का आधार।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)