अश्क़.......
अश्क़ बहते हुए यें ख्याल आ गया
कि अश्क़ बहते हुए यें ख्याल आ गया
जब नयन मे भरे तो वो झील लगे
जब पलक पर गिरे तो फुवारे लगे
कब वो निरझर बना यें पता ही नही
अश्क़ बहते हुए यें ख्याल आ गया
कि अश्क़ बहते हुए यें ख्याल आ गया
जाब वो स्पर्श, गालो क़ो करता गया
यूँ तो मोती लगा वो गिरते हुए
कब सरिता बना यें पता ही नहीं
अश्क़ बहते हुए यें ख्याल आ गया
कि अश्क़ बहते हुए यें ख्याल आ गया
अश्रु कब यें मधुर से खारे हुए
यू तो रदपट पे गिरकर यें मालूम हुआ
कब सरिता यें बनकर समुन्दर हुआ
अश्क़ बहते हुए यें ख्याल आ गया
कि अश्क़ बहते हुए यें ख्याल आ गया
अश्रु बनकर जो यूँ तू भी गायब हुआ
यें भी सुखी यें बंजर जमीं बन गई है
अब ना मोती बचे ना यें सागर रहा
दीपिका सराठे