गुरु शिष्य
कुण्डलिया
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गुरू शिष्य के स्वप्न को, कर देता साकार।
ज्यों अनघड़ पाषाण को, दे देता आकार।
दे देता आकार, निखर उठता है चिन्तन।
जले ज्ञान का दीप, धन्य हो जाता जीवन।
कहते वैद्य सुरेन्द्र, दृश्य स्वर्णिम भविष्य के।
हो जाते अभिव्यक्त, सहज ही गुरू शिष्य के।
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-सुरेन्द्रपाल वैद्य, ०७/०९/२०२५