हो तेरा घर बार कुत्तों का...!
है किस्सा यह जमाने मे, की क्यों मशहूर है कुत्ता,
नहीं सुनता किसी की भी, इतना मगरूर है कुत्ता।
ये कुत्तो का जमाना है, बना हर शख्सियत कुत्ता,
कहीं पर अर्दली, हाकिम, कहीं मजदूर है कुत्ता।।
सुना है वफादार है कुत्ता, सलीकेदार है कुत्ता,
नही है मारता यह मुँह, तो इज़्ज़तदार है कुत्ता।
वफ़ा के नाम पर तुझको, मसीहा मानता मै भी,
जरूरत है तू कुत्ते की, तेरा किरदार है कुत्ता।।
कनक काया रही है देख, टपकाता लार है कुत्ता,
बड़े ही शोख से कहतें है कि, मिलनसार है कुत्ता।
मगर न जो दुम हिलाता हो, हसीनो के इशारे पर,
बताते रहते उसको फिर, बड़ा ही बेकार है कुत्ता।।
लगता प्यारा सभी को तब, जो तलवे चाट ले कुत्ता।
नजर आता नही है वह, जिसको यह काट ले कुत्ता।।
रखो तुम बाँध के ये भौकता, मुझ जैसे आशिक पर।
है डर इसको कहि तुझको, नही ये बाँट ले कुत्ता।।
बधाई हो करूंगा मै भी, अबसे सत्कार कुत्तों का,
पसन्द आया मुझे जबसे, सही व्यवहार कुत्तों का।
ओ कंचन कामनी भरता रहे, तुम्हारा गोद कुत्तों से,
बनो तुम कुत्तों की रानी, हो तेरा घर बार कुत्तों का।।
©® पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित २६/०६/२०२०)