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8 Sep 2025 · 1 min read

तुम और मौसम

तुम
किसी पहाड़ी गाँव की अमराई हो,
तुम हो तो महक, वसंत,
कोयल की कूक,
मेरे ख़यालों की डालियों पर पंछियों की चहक,
रंग-बिरंगी तितलियाँ—
मेरे मौसम में।

तुम
उस पार से आती पुरवाई हो।
मन के क्षितिज पर उड़ती चुनरिया लहराती है,
घनी जुल्फ़ों की बदरियाँ,
तेरा नाम पुकारती,
मुझे पास बुलाती।
भीगे मौसम की महक
धीरे-धीरे उतर आती है
मेरे जीवन में।

तुम
अपनी मौज में बलखाती नदिया हो।
मैं पनघट-सा खड़ा
चुपचाप तुम्हें निहारता,
तेरी हर हिलोर पर अनायास मुस्कुराता।

तेरे स्पर्श से
मेरे ख़्वाब जवाँ बने रहते हैं।
तेरी आहट से
डगमगाती मन-नाव संभलने लगती है।

हाँ, तुम ही मेरी मृगतृष्णा हो।

✍️ दुष्यंत कुमार पटेल

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