दो विदा कि...!
दो विदा कि छोड़ दु अब, गाँव कमाने के लिए।
भूख और कर्ज़ से बस, जान बचाने के लिए।।
है क्षुधा कि आग जलती, मांग रही जो रोटियां।
जोड़ लाऊँगा कमाई, आग बुझाने के लिए।।
भार क्या रखे सरों पर, कौन उसे है जानता।
जी रहें अभी तलक हम, बोझ उठाने के लिए।।
हो बड़े यही बच्चे कल, पूछ रहे क्या हो किए।
टोकना न चाहिए हर, बात बताने के लिए।।
देखते रहे सम्बन्धी, और सगे है दोस्त जो।
कल समय न व्यर्थ लेंगे, देह जलाने के लिए।।
©® पांडेय चिदानंद “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ०३/०९/२०२४)