ज़िम्मेदारी...!
हर कलम अपनी दास्तान, खुद ही जता देता है।
किसने क्या लिखा किस्सा, जमाना बता देता है।।
रखतें हैं शक्लों को क्यो, मासूम सा बनाकर।
ख्वाहिश सभी चेहरे का, मुखौटा हटा देता है।।
दीवानगी तो देखो इस, नामुराद खाकसार की।
अक्सर चाहतों में अपने, आसमाँ झुका देता है।।
एक उम्र छुड़ा देता है, डालों का फुदक लेना।
शाख ज़िम्मेदारी का, सबको ही बिठा देता है।।
क्यों बोझिल सी है आँखे, मायूस क्यों है चेहरा।
“चिद्रूप” क्या ज़िम्मेदारी, सबको थका देता है।।
©® पांडेय चिदानंद “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित १६/०३/२०२४)