अनोखा जन्मदिन
शनिवार की रात अचानक एक अभिभावक का फोन आया। बहुत आग्रह से उन्होंने कहा कि कल उनके बच्चे का जन्मदिन है और पूरे परिवार की इच्छा है कि मैं वहाँ उपस्थित रहूँ और बच्चे को आशीर्वाद दूँ। इतना ही नहीं, उन्होंने बड़े उत्साह से एक डिजिटल कार्ड भी भेज दिया। औपचारिक निमंत्रण था, इसलिए विद्यालय के अध्यक्ष महोदय से अनुमति लेना आवश्यक था। मैंने संकोचपूर्वक कार्ड उन्हें दिखाया और कहा कि यदि वे अनुमति दें तो मैं वहाँ जाना चाहूँगी। उन्होंने सहज मुस्कान के साथ उत्तर दिया—“यदि आप अपने व्यस्त जीवन से समय निकाल सकती हैं, तो अवश्य जाइए।”
रविवार का दिन मेरे लिए हमेशा व्यस्त होता है—चार-चार शिफ्ट की ट्यूशन और घरेलू कामों से भरा। फिर भी अभिभावक की विनम्रता और आग्रह ने मुझे जाने के लिए विवश कर दिया। पार्टी में जाने से पहले मैंने मन ही मन ठान लिया था—भले ही मैं जीवन में शाकाहारी भोजन को उतना पसंद नहीं करती, इस घर में वे शाकाहारी हैं। इसलिए मैं कुछ मिठाइयों और स्टार्टर्स के अलावा किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाऊँगी। बस औपचारिकता निभाऊँगी और जल्दी लौट आऊँगी।
अभिभावक ने विशेष रूप से कहा था कि मैं अपनी छोटी बेटी को साथ लाऊँ। उसकी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। कारण स्पष्ट था—कोल्ड ड्रिंक और आइसक्रीम! ये दोनों चीजें घर में निषिद्ध थीं। मैंने उसे पहले ही समझा दिया कि चाऊमीन और पास्ता जैसी चीज़ें मत खाना, पुलाव और पनीर मिले तो ठीक है। पर मन ही मन मुझे पता था कि आइसक्रीम देखकर उसका मन बहक ही जाता है ।
घर में इस निर्णय को लेकर वातावरण गर्म रहा। पति महोदय ने नाराज़ होकर कहा कि इतना काम पड़ा है और मुझे पार्टी की सूझी है। मैंने शांत भाव से उत्तर दिया कि बच्ची का जन्मदिन है, उसकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए और मैं जल्दी लौट आऊँगी। अंततः उन्होंने हार मान ली और स्कूटर निकालकर मुझे बेटी सहित वहाँ छोड़ आए।
गूगल मैप की गलियों से गुज़रते हुए हम स्थान पर पहुँचे। दरवाज़ा खुला तो साधारण-सा घर दिखा। मैं सोचने लगी कि शायद जल्दी पहुँच गई हूँ या देर से। सच यही था कि पार्टी बस इसी सादगी में सजी थी।
सबसे पहले एक गिलास थमाया गया। मुझे लगा यह कोल्ड ड्रिंक होगा, मैंने बेटी को इशारे से रोका। सावधानी से चखा तो राहत मिली—यह तो पानी था। लेकिन उसी क्षण मैंने बेटी का चेहरा देखा। उसकी आँखों में मायूसी और होंठों पर गहरी निराशा थी। जिस ठंडे पेय का सपना लेकर वह यहाँ आई थी, उसकी जगह सादा पानी मिलना उसके मन पर बड़ा आघात था। मुझे साफ़ लगा कि उसका उत्साह जैसे पल भर में बुझ गया हो।
कुछ देर बाद खेल और बातचीत के बीच मस्ती चल रही थी। मैं चुपचाप बैठी थी, समय बिता जा रहा था। फिर केक काटने की तैयारी शुरू हुई। पहले नकली केक रखा गया, ग्लिटर उड़ाए गए, बच्ची ने फूँक मारी और सभी ने तालियाँ बजाईं। मैं भी तालियाँ बजा रही थी, लेकिन मन ही मन सोच रही थी—“क्या मैं यहाँ सिर्फ केक काटने, तालियाँ बजाने और दिखावे के लिए उपस्थित हूँ?” यह सोचते हुए मैं हल्के व्यंग्य और संकोच में मुस्कुरा रही थी।
केक काटने और आडंबर के बाद मुख्य भोजन परोसा गया। यह वही पल था जब मेरी पूर्व योजना—कुछ मिठाइयों और स्टार्टर्स के अलावा किसी चीज़ को हाथ न लगाना—ध्वस्त हो गई। मैं न चाहते हुए भी कुछ निवाले खा ही बैठी। मुख्य भोजन में बड़ी-सी पूरी और काबुली चना, वह भी बिना प्याज़-लहसुन का, परोसा गया। नवरात्रि के कन्या-भोजन का वही स्वाद उतर आया था।
फिर पास्ता आया, इतना सफेद कि पहली नज़र में मुझे रबड़ी लगने लगी। स्वाद लेने पर पता चला कि यह वही पास्ता है जिससे मैं जीवनभर दूरी बनाए रखती रही हूँ। मिठाई में परोसे गए रसगुल्ले इतने छोटे थे कि लगा मानो पंद्रह साल बाद इन्हें फिर से देखने का सौभाग्य मिला हो।
मन कहीं संतुष्ट नहीं था। मैंने पति को संदेश भेजा कि मुझे जल्दी ले जाएँ। वे तुरन्त आ गए। अभिभावक ने उन्हें भी ऊपर बुलाने का प्रयास किया, पर मैं मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती रही कि वे नीचे ही रहें। सौभाग्य से ऐसा ही हुआ और हम घर लौट आए। रास्ते भर बेटी पार्टी का हाल सुनाती रही और पति मेरी खिल्ली उड़ाते रहे। घर पहुँचकर भी मुझे खूब चिढ़ाया गया। मैंने बस इतना कहा कि मैं वहाँ सिर्फ बच्ची को आशीर्वाद देने गई थी, पार्टी जैसी भी थी उसमें मेरा क्या दोष।
पर असली झटका तो सोमवार को लगा। वही बच्ची विद्यालय में आई और बोली—“मैडम, मैं कल छुट्टी पर रहूँगी।” मैंने पूछा, “क्यों बेटा?” तो उसने मासूमियत से उत्तर दिया—“मेरा असली जन्मदिन है न!”
मैं सुनकर दंग रह गई, नि:शब्द भी और विस्मित भी। उसी क्षण मैंने मन-ही-मन कसम खा ली कि अब अपनी पूरी जिंदगी में यदि किसी ने भी मुझे जन्मदिन पर बुलाया तो मैं कभी अपने पैर आगे नहीं बढ़ाऊँगी।