कुण्डलिया छंद
🙏
!! श्रीं !!
सुप्रभात !
जय श्री राधेकृष्ण !
शुभ हो आज का दिन !
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घाटी से मन में खिले, सुंदर सुरभित फूल ।
किंतु न दिखते वे हमें, पड़ी कर्म की धूल ।।
पड़ी कर्म की धूल, हुआ धुँधला मन दर्पण।
सच्चे मन से कभी, नहीं करता कुछ अर्पण।।
क्यों न देखता झाँक, दिव्यता उर की पाटी ।
अंतर्मन में देख , दिव्य है मन की घाटी ।।
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राधे…राधे…!
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महेश जैन ‘ज्योति’,
मथुरा ।
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