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7 Sep 2025 · 1 min read

ग़मों को जब से आबाद किया है,

ग़मों को जब से आबाद किया है,
शहर-ए-दिल बसाकर
साँसें आहिस्ता-आहिस्ता टूट रही हैं
शिकस्त खाकर

©️ डॉ. शशांक शर्मा “रईस”

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