वो कहती है अपना जीवन पृथक–पृथक सा लगता है।
सबका मिलना सफल हुआ पर अपना सपना लगता है,
वो कहती है अपना जीवन पृथक–पृथक सा लगता है।
वो आए तो घोर अंधेरी राते भोर बनाती हैं,
वो जाए तो गर्मी में भी आंखे बारिश करती हैं।
हंसती है तो जैसे कलियां बगिया में खिल उठती है,
वो रूठे तो सावन की वर्षा भी पतझड़ लगती है।
एक लड़की जब रूठ चले तो जीवन सुना लगता है,
वो कहती है अपना जीवन पृथक–पृथक सा लगता है।
सबका मिलना सफल हुआ पर अपना सपना लगता है,
वो कहती है अपना जीवन पृथक पृथक सा लगता है।।
लेखक/कवि
अभिषेक सोनी “अभिमुख”
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